यह श्लोक जोड़ों में विरोधाभास देता है। सब इन्द्रियों के गुणों से चमकता है — फिर भी सब इन्द्रियों से रहित है। सबका पालन करता है — फिर भी अनासक्त है। निर्गुण है — फिर भी गुणों का भोक्ता है।
यह विरोधाभास बताता है कि ब्रह्म को साधारण तर्क से नहीं समझा जा सकता। जैसे सूरज की रोशनी से सब दिखता है, पर सूरज खुद हर चीज़ में नहीं है — कुछ-कुछ वैसे ही ब्रह्म का संबंध जगत से है।