📿 श्लोक संग्रह

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि

गीता 13.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥
ज्ञेयम्
जानने योग्य
यत्
जो
तत्
वह
प्रवक्ष्यामि
मैं कहूँगा
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
अमृतम्
अमरत्व
अश्नुते
प्राप्त होता है
अनादिमत्
अनादि (जिसका आदि नहीं)
परम्
परम
ब्रह्म
ब्रह्म
न सत्
न सत् (न है)
न असत्
न असत् (न नहीं है)
उच्यते
कहा जाता है

अब कृष्ण 'ज्ञेय' — जानने योग्य वस्तु — के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं — जिसे जानने से अमरत्व मिलता है, वह अनादि परब्रह्म है। उसका कोई आरंभ नहीं है।

और वह ब्रह्म न 'सत्' है, न 'असत्' — यानी उसे 'है' या 'नहीं है' की भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। जैसे आकाश को मुट्ठी में नहीं पकड़ा जा सकता — उसी तरह ब्रह्म को साधारण शब्दों में नहीं समाया जा सकता।

यह श्लोक उपनिषद परंपरा से गहरे जुड़ा है। 'नेति नेति' — न यह, न वह — का जो उपनिषदों का दृष्टिकोण है, वही यहाँ 'न सत् न असत्' में व्यक्त होता है।

गीता प्रेस पाठ में यह तेरहवाँ श्लोक है। इसके बाद के चार-पाँच श्लोकों में ब्रह्म के स्वरूप का काव्यात्मक वर्णन आता है।

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