📿 श्लोक संग्रह

अद्वेष्टा सर्वभूतानां

गीता 12.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
अद्वेष्टा
द्वेष न करने वाला
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों से
मैत्रः
मित्रता रखने वाला
करुणः
करुणावान
एव च
और भी
निर्ममः
ममता रहित
निरहङ्कारः
अहंकार रहित
समदुःखसुखः
सुख-दुःख में समान
क्षमी
क्षमाशील

इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि उनका प्रिय भक्त कैसा होता है। सबसे पहली बात — वह किसी से द्वेष नहीं रखता। न किसी से जलन, न किसी से नफ़रत। सबसे मित्रता का भाव रखता है और सबके प्रति करुणा (दया) रखता है।

फिर कहा गया — वह न तो 'मेरा-मेरा' करता है और न 'मैं-मैं'। ममता और अहंकार — ये दो चीज़ें मनुष्य को सबसे ज़्यादा बाँधती हैं। जो इनसे मुक्त है, वह सहज हो जाता है, हल्का हो जाता है — जैसे बादल बरसकर हल्का हो जाता है।

सुख-दुःख में समान रहना और क्षमाशील होना — ये भक्त के सबसे व्यावहारिक गुण हैं। कोई ग़लती करे तो माफ़ कर देना, कोई दुःख आए तो विचलित न होना। जैसे दादा-दादी बच्चों की ग़लतियाँ माफ़ कर देते हैं — वैसा ही स्वभाव सच्चे भक्त का होता है।

यह श्लोक गीता के बारहवें अध्याय भक्तियोग से है। अर्जुन ने कृष्ण से पूछा कि आपको कौन-सा भक्त सबसे प्रिय है। कृष्ण ने इसके उत्तर में भक्त के लक्षण बताए — यह श्लोक उसी उत्तर का भाग है।

12.13 से 12.19 तक के श्लोकों में भक्त के लक्षणों का विस्तृत वर्णन है। परंपरा में इन श्लोकों को 'भक्त-लक्षण' के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।

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