📿 श्लोक संग्रह

न तु मां शक्यसे द्रष्टुम्

गीता 11.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
अनेन स्वचक्षुषा
इन अपनी आँखों से
दिव्यम् चक्षुः
दिव्य नेत्र
ददामि
देता हूँ
योगम् ऐश्वरम्
मेरा ऐश्वर्ययोग

कृष्ण कहते हैं — तुम इन साधारण आँखों से मुझे नहीं देख सकते। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि दे रहा हूँ — उससे मेरा ऐश्वर्यमय योग देखो। जैसे अँधेरे में दीपक जलाए बिना चित्र दिखता नहीं, वैसे ही दिव्य दृष्टि के बिना विश्वरूप नहीं दिखता।

यह दिव्य दृष्टि कृष्ण की कृपा से मिलती है। यही कारण है कि संजय को भी व्यास जी ने दिव्य दृष्टि दी थी — ताकि वे युद्धभूमि का दृश्य धृतराष्ट्र को सुना सकें।

यह श्लोक एक महत्वपूर्ण दार्शनिक बिंदु है — परमात्मा का यथार्थ दर्शन बाहरी इंद्रियों से नहीं, आंतरिक अनुभव से होता है।

अगले श्लोक (11.9) में संजय बताएंगे कि इसके बाद कृष्ण ने वास्तव में विश्वरूप दिखाया।

अध्याय 11 · 8 / 55
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