📿 श्लोक संग्रह

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नम्

गीता 11.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥
इह एकस्थम्
यहाँ एक में स्थित
जगत् कृत्स्नम्
समस्त जगत
सचराचरम्
चर और अचर सहित
गुडाकेश
हे गुडाकेश (अर्जुन)

कृष्ण कहते हैं — हे गुडाकेश, आज मेरे इस एक शरीर में समस्त जगत — चर और अचर सब — एक साथ देखो। और जो कुछ और देखना चाहो, वह भी यहीं है। जैसे आकाश में असंख्य तारे हों पर आकाश एक ही हो।

'गुडाकेश' का अर्थ है — जिसने निद्रा को जीत लिया। यह संबोधन अर्जुन की जागरूकता और धनुर्विद्या में महारत का सूचक है।

यह विश्वरूप का केंद्रीय भाव है — सारी सृष्टि एक ही परमात्मा में समाई है। यह वेदांत का 'एकमेवाद्वितीयम्' का साकार दर्शन है।

अगले श्लोक (11.8) में कृष्ण बताएंगे कि यह रूप साधारण आँखों से नहीं, दिव्य दृष्टि से ही दिखेगा।

अध्याय 11 · 7 / 55
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