अर्जुन बड़े विनम्र भाव से कहते हैं — हे प्रभु, यदि आप यह उचित समझें कि मैं आपका वह रूप देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, मुझे अपना अव्यय रूप दिखाइए। 'यदि संभव हो' — यह विनम्रता की पराकाष्ठा है।
अर्जुन जानते हैं कि वह रूप साधारण नेत्रों से नहीं देखा जा सकता। इसीलिए वे कृष्ण की इच्छा पर छोड़ते हैं। यही भक्त का स्वभाव है — माँगना पर जबरदस्ती नहीं।