📿 श्लोक संग्रह

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः

गीता 11.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
वायुः यमः अग्निः वरुणः शशाङ्कः
वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा
प्रजापतिः
प्रजापति
प्रपितामहः
परदादा (ब्रह्मा के भी पिता)
नमो नमः सहस्रकृत्वः
हजार बार नमस्कार

अर्जुन कहते हैं — आप ही वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं, वरुण हैं, चंद्रमा हैं, प्रजापति हैं और सबके परदादा भी आप ही हैं। आपको हजार बार नमस्कार, फिर से और फिर से नमस्कार।

यह श्लोक अर्जुन की भक्ति-भावना की पराकाष्ठा है। 'सहस्रकृत्वः नमः' — हजार बार प्रणाम — शब्द कम पड़ रहे हैं, इसलिए वे बार-बार नमस्कार करते हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। वैदिक परंपरा के सभी प्रमुख देव — वायु, अग्नि, वरुण, यम — सब कृष्ण के रूप हैं।

अगले श्लोक (11.40) में अर्जुन कहेंगे — सामने से, पीछे से, सब ओर से आपको नमस्कार।

अध्याय 11 · 39 / 55
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