📿 श्लोक संग्रह

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्

गीता 11.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥
गरीयसे
जो ब्रह्मा से भी बड़े हैं
आदिकर्त्रे
प्रथम कर्ता को
अनन्त देवेश
हे अनंत, हे देवेश
सदसत्तत्परम्
सत्-असत् और उससे भी परे

अर्जुन कहते हैं — हे महात्मन, ये सब आपको नमन क्यों न करें? आप ब्रह्मा से भी बड़े हैं, आप सृष्टि के प्रथम कर्ता हैं। हे अनंत, हे देवेश, हे जगन्निवास — आप ही अक्षर हैं, सत्-असत् और उससे भी परे हैं।

यहाँ अर्जुन एक गहरी बात कहते हैं — 'सदसत्तत्परम्' — सत् भी, असत् भी और फिर उससे भी परे। यह उपनिषदों का 'ब्रह्म' का वर्णन है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन यहाँ कृष्ण को ब्रह्मा के ऊपर रखते हैं — सृष्टिकर्ता भी उनसे छोटे हैं।

अगले श्लोक (11.38) में अर्जुन कहेंगे — आप ही आदि देव हैं, पुरातन पुरुष हैं, जगत का परम निधान हैं।

अध्याय 11 · 37 / 55
अध्याय 11 · 37 / 55 अगला →