📿 श्लोक संग्रह

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या

गीता 11.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥
स्थाने
उचित ही है
तव प्रकीर्त्या
आपकी कीर्ति से
जगत् प्रहृष्यति
जगत आनंदित होता है
रक्षांसि भीतानि
राक्षस भयभीत होकर

अर्जुन कहते हैं — हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से जगत आनंदित होता है और अनुरक्त होता है। राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगण आपको प्रणाम कर रहे हैं।

जो भव्य, महान और शुभ है — उसे देखकर जगत प्रसन्न होता है। यह सत्य का स्वाभाविक प्रभाव है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन का दूसरा स्तवन-क्रम (11.36-46) यहाँ शुरू होता है।

अगले श्लोक (11.37) में अर्जुन प्रश्न करेंगे — आप ब्रह्मा से भी बड़े हैं, फिर ये सब आपको क्यों न नमन करें?

अध्याय 11 · 36 / 55
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