📿 श्लोक संग्रह

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि

गीता 11.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
दंष्ट्राकरालानि
दाँतों से भयानक
कालानलसन्निभानि
प्रलय की अग्नि जैसे
दिशो न जाने
दिशाएं नहीं सूझतीं
प्रसीद जगन्निवास
हे जगन्निवास, प्रसन्न हों

अर्जुन करुणा से बोलते हैं — हे देवेश, हे जगन्निवास, आपके भयानक दाँतों वाले मुखों को — जो प्रलय की अग्नि जैसे हैं — देखकर मुझे दिशाएं नहीं सूझतीं। कोई शांति नहीं मिलती। कृपा करें।

यह अर्जुन की पहली प्रत्यक्ष प्रार्थना है जिसमें वे राहत माँग रहे हैं। 'जगन्निवास' — जगत में निवास करने वाले — यह संबोधन उनकी शरण का भाव दिखाता है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन का यह भय देखकर कृष्ण अंत में (11.49) कहेंगे — 'मत डरो, प्रसन्न मन से मेरा पहले वाला रूप देखो।'

अगले दो श्लोकों (11.26-27) में अर्जुन धृतराष्ट्र के पुत्रों, भीष्म, द्रोण आदि को विराट मुखों में जाते देखेंगे।

अध्याय 11 · 25 / 55
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