📿 श्लोक संग्रह

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रम्

गीता 11.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥
बहुवक्त्रनेत्रम्
अनेक मुख और नेत्र वाला
बहुबाहूरुपादम्
अनेक भुजा-जंघा-पाँव वाला
बहुदंष्ट्राकरालम्
अनेक दाँतों से भयानक
लोकाः प्रव्यथिताः
लोग काँप रहे हैं

अर्जुन कहते हैं — हे महाबाहो, आपका यह विशाल रूप — अनेक मुख-नेत्र, अनेक भुजा-जंघा-पाँव, अनेक पेट, अनेक दाँतों से भयानक — देखकर लोग काँप रहे हैं और मैं भी काँप रहा हूँ।

यह श्लोक बताता है कि विश्वरूप भव्यता के साथ-साथ भय भी उत्पन्न करता है। यह भय श्रद्धा का एक रूप है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन यहाँ अपने भय को छिपाते नहीं — वे ईमानदारी से अपनी प्रतिक्रिया बताते हैं।

अगले श्लोक (11.24) में अर्जुन कहेंगे कि यह रूप देखकर मेरा अंतर काँप उठता है और मुझे शांति नहीं मिलती।

अध्याय 11 · 23 / 55
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