📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥
पद-अर्थ (शब्द-दर-शब्द)
रुद्रादित्या वसवः साध्याः
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण
विश्वे अश्विनौ मरुतः
विश्वदेव, दोनों अश्विनी, मरुद्गण
उष्मपाः
पितृगण (उष्मा-पान करने वाले)
विस्मिताः
विस्मित, चकित
सरल हिन्दी व्याख्या
संदर्भ और महत्व
यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। यहाँ देव-वर्गों की जो सूची है वह वेद और पुराणों की परंपरागत देव-श्रेणियों से मेल खाती है।
अगले श्लोक (11.23) में अर्जुन अपना व्यक्तिगत भय और विस्मय बताएंगे।
अध्याय 11 · 22 / 55