📿 श्लोक संग्रह

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम्

गीता 11.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥
अनादिमध्यान्तम्
जिसका आदि-मध्य-अंत नहीं
अनन्तवीर्यम्
अनंत शक्ति वाला
शशिसूर्यनेत्रम्
चंद्र और सूर्य जिसके नेत्र हैं
दीप्तहुताशवक्त्रम्
प्रज्वलित अग्नि जैसे मुख वाला

अर्जुन कहते हैं — आपका न आदि है, न मध्य, न अंत। आपकी शक्ति अनंत है, भुजाएं अनगिनत हैं। चंद्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं। आपके मुख से प्रज्वलित अग्नि निकल रही है और आप अपने तेज से समस्त जगत को तपा रहे हैं।

सूर्य-चंद्र को नेत्र कहना एक पुरातन वैदिक उपमा है। जैसे सूर्य दिन में जगत को देखता है और चंद्रमा रात में — वैसे ही परमात्मा की दृष्टि सदा सक्रिय है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन का विश्वरूप-स्तवन जारी है। 'तपन्तम्' — तपाना — यहाँ सृष्टि को चलाने की ऊर्जा का संकेत है।

अगले श्लोक (11.20) में अर्जुन बताएंगे कि स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सारा आकाश आपसे ही भरा हुआ है।

अध्याय 11 · 19 / 55
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