संजय एक असाधारण उपमा देते हैं — यदि आकाश में एक साथ हजार सूर्य उदय हो जाएं, तो उनकी सम्मिलित रोशनी उस महात्मा के तेज के समान हो सकती है। जैसे एक दीपक की रोशनी का हम अनुमान लगा सकते हैं — पर असंख्य दीपकों की रोशनी की कल्पना भी कठिन होती है।
यह उपमा बताती है कि विश्वरूप का प्रकाश मानव कल्पना से परे है। संजय शब्दों की सीमा स्वीकार करते हुए भी यह प्रयास करते हैं।