📿 श्लोक संग्रह

दिव्यमाल्याम्बरधरम्

गीता 11.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरम्
दिव्य माला और वस्त्र धारण किए
दिव्यगन्धानुलेपनम्
दिव्य सुगंध से लिपा हुआ
सर्वाश्चर्यमयम्
सब आश्चर्यों से भरा
विश्वतोमुखम्
सब दिशाओं में मुख वाला

संजय वर्णन जारी रखते हैं — वह देव दिव्य माला और वस्त्र धारण किए था, दिव्य सुगंध से लिपा हुआ था। वह सब आश्चर्यों का भंडार था — अनंत, सब दिशाओं में मुख वाला। ऐसा रूप न पहले किसी ने देखा था, न सोचा था।

यह 11.10-11 एक युगल-श्लोक है। दोनों मिलकर विश्वरूप का अवर्णनीय वैभव प्रकट करते हैं।

इन दो श्लोकों (11.10-11) के बाद संजय एक उपमा देंगे — यदि हजार सूर्य एक साथ आकाश में उदय हों तो शायद उस प्रकाश से यह रूप का तेज मिलता-जुलता हो।

'विश्वतोमुखम्' — सब दिशाओं में मुख — यह इस बात का प्रतीक है कि परमात्मा से कोई दिशा खाली नहीं है।

अध्याय 11 · 11 / 55
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