यह श्लोक (10.4) और अगला (10.5) मिलकर एक लंबी सूची बनाते हैं। कृष्ण कह रहे हैं — जो भी मनुष्य के मन में होता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा — बुद्धि भी, भय भी, सुख भी, दुःख भी — वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। यह सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन यह सृष्टि की पूर्णता का बयान है।
यहाँ केवल अच्छे गुण नहीं गिने गए — भय, दुःख, अभाव — ये भी सूची में हैं। इसका अर्थ यह है कि परमात्मा केवल शुभ का स्रोत नहीं है — वे सम्पूर्ण अस्तित्व का स्रोत हैं। यह दृष्टि मनुष्य को जीवन की हर परिस्थिति में स्थिर रखती है।