📿 श्लोक संग्रह

सर्गाणामादिरन्तश्च

गीता 10.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥
सर्गाणाम्
सृष्टियों का
आदिः अन्तः च
आदि और अंत
मध्यम् च एव
और मध्य भी
अहम् अर्जुन
मैं हूँ, अर्जुन
अध्यात्मविद्या
अध्यात्म-विद्या
विद्यानाम्
विद्याओं में
वादः
सत्य-तर्क — वाद
प्रवदताम् अहम्
बोलने वालों में मैं

यह श्लोक 10.20 की याद दिलाता है जहाँ कृष्ण ने कहा था — मैं सब प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ। यहाँ वही बात सृष्टियों के संदर्भ में कही गई है। हर रचना — चाहे वह सृष्टि हो, विचार हो, या ग्रंथ — उसका आदि, मध्य और अंत परमात्मा में है।

विद्याओं में अध्यात्म-विद्या — स्वयं को जानने की विद्या — सबसे श्रेष्ठ है। और वाद — जिसमें सत्य की खोज हो, न केवल जीतने की इच्छा। जहाँ तर्क सत्य की ओर ले जाए, वहाँ परमात्मा हैं।

अध्यात्म-विद्या का उल्लेख गीता के 13वें अध्याय में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संदर्भ में भी आता है। 10.32 में उसे सब विद्याओं में श्रेष्ठ कहना गीता की आत्म-केंद्रित दृष्टि को दर्शाता है।

भारतीय दर्शन में 'वाद' और 'जल्प' में अंतर है — वाद सत्य-खोज है, जल्प जीत की इच्छा है। कृष्ण का कहना है कि वे वाद में हैं — सत्य की ओर जाने वाले संवाद में।

अध्याय 10 · 32 / 42
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