यहाँ से सञ्जय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का दृश्य सुनाना शुरू करते हैं। पाण्डवों की सेना को व्यूह-रचना में सजा देखकर दुर्योधन के मन में चिन्ता उत्पन्न हुई। पाण्डवों की सेना इतनी सुव्यवस्थित थी कि दुर्योधन को अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर बात करनी पड़ी।
ध्यान दीजिए — दुर्योधन सबसे पहले भीष्म पितामह के पास नहीं गया, बल्कि द्रोणाचार्य के पास गया। इसके पीछे एक कारण था — द्रोणाचार्य पाण्डवों के भी गुरु थे। दुर्योधन शायद उन्हें यह याद दिलाना चाहता था कि सामने खड़ी सेना में उनके अपने शिष्य भी हैं।
यह श्लोक हमें बताता है कि दुर्योधन भीतर से असुरक्षित था। जो व्यक्ति अपनी शक्ति में विश्वास रखता है, उसे दूसरों को उकसाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।