बहुत समय पहले की बात है। एक तालाब में तीन मछलियाँ रहती थीं। तीनों की सोच अलग-अलग थी।
पहली मछली बहुत सूझबूझ वाली थी। वह हमेशा पहले से सोचकर चलती थी। दूसरी मछली मौके पर चतुराई दिखाती थी। तीसरी मछली कहती थी — जो होगा, देखा जाएगा।
एक दिन कुछ मछुआरे उस तालाब के पास आए। उन्होंने आपस में बातें कीं — कल यहाँ जाल डालेंगे, मछलियाँ बहुत हैं।
पहली मछली ने सुन लिया। उसने उसी रात तालाब छोड़ दिया। वह एक नाले से होते हुए दूसरी नदी में चली गई। उसने दोनों साथियों को भी बुलाया, पर दोनों ने मना कर दिया।
अगले दिन मछुआरों ने जाल डाला। दूसरी मछली जाल में फँसी, पर उसने तुरंत मरी हुई जैसी हो गई। मछुआरों ने उसे जाल के बाहर फेंक दिया। वह पानी में वापस आ गई।
तीसरी मछली जाल में फँसी। वह बस सोचती रही — अब क्या होगा, भगवान जाने। वह निकल न पाई।
उस दिन से तालाब के जानवर कहते हैं — आने वाली मुसीबत को पहले से भाँपो। और अगर भाँप न पाओ तो मौके पर सोचो। केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहना ठीक नहीं।