📚 पंचतंत्र

कौवा और घड़ा

उम्र 5–10 साल 3 मिनट विद्वान पंडित विष्णु शर्मा की कथा
📖 पंचतंत्र — विष्णु शर्मा रचित, लगभग 200 ईसा पूर्व

बहुत समय पहले की बात है। एक घना जंगल था जहाँ एक चतुर कौवा रहता था।

गर्मियों के दिन थे। धूप तेज़ थी और कई दिनों से बारिश नहीं हुई थी। कौवे को बहुत प्यास लगी थी।

वह पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ा। नदी सूख चुकी थी। तालाब में कीचड़ था। पेड़ों की पत्तियाँ मुरझा गई थीं।

उड़ते-उड़ते कौवे को एक घर के बाहर एक मिट्टी का घड़ा दिखाई दिया। वह खुशी से नीचे उतरा।

पर जब उसने चोंच घड़े के अंदर डाली, तो पानी बहुत नीचे था। चोंच वहाँ तक पहुँच नहीं पा रही थी।

कौवे ने सोचा — "पानी है, पर मिल नहीं रहा। क्या करूँ?"

एक कमज़ोर कौवा हार मान कर उड़ जाता। पर यह कौवा चतुर था। उसने आँखें बंद कीं और सोचने लगा।

तभी उसकी नज़र पास पड़े कंकड़ों पर पड़ी। उसके मन में एक विचार आया।

उसने एक-एक करके कंकड़ उठाए और घड़े में डालने लगा। एक कंकड़... दो कंकड़... दस कंकड़... बीस कंकड़।

जैसे-जैसे कंकड़ डलते गए, पानी ऊपर उठता गया। थोड़ी देर बाद पानी घड़े के मुँह तक आ गया।

कौवे ने अपनी चोंच डाली और मीठा ठंडा पानी पिया। उसकी प्यास बुझी और मन प्रसन्न हो गया।

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💡 इस कहानी की सीख
मुश्किल में हार मत मानो — दिमाग से काम लो।
जब रास्ता बंद लगे, तब घबराने की नहीं, सोचने की ज़रूरत है। जैसे कौवे ने कंकड़ों से पानी ऊपर लाया, वैसे ही हम भी अपनी मुश्किलों का हल ढूँढ सकते हैं — बस थोड़ा धैर्य और दिमाग चाहिए।
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