भागवत पुराण के अनुसार, गोकुल में हर साल एक परंपरा थी। इंद्र देव की पूजा की जाती थी। नंद बाबा और गाँव के लोग बड़ा भोग बनाते। इंद्र को चढ़ाते। यह कई सालों से चला आ रहा था।
एक बार कृष्ण ने नंद बाबा से पूछा — 'बाबा, यह पूजा किसलिए?' नंद बाबा ने कहा — 'इंद्र देव वर्षा भेजते हैं। इसलिए।' कृष्ण ने कहा — 'बाबा, हमें जो वर्षा मिलती है, वह गोवर्धन पर्वत से मिलती है। वहाँ की हरियाली से हमारी गाएँ चरती हैं। गोवर्धन की पूजा करो।'
नंद बाबा ने बात मानी। गोकुल के लोगों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की। बड़ा भोग बना। सब मिलकर पर्वत के चारों ओर गए।
इंद्र को यह बात अच्छी नहीं लगी। भागवत पुराण में वर्णित है कि इंद्र क्रोधित हो गए। उन्होंने मेघों को आदेश दिया। घनघोर बादल आए। बिजली कड़की। तेज़ हवाएँ चलीं। मूसलाधार वर्षा होने लगी। ऐसी वर्षा जो रुकने का नाम न ले।
गोकुल डूबने लगा। गाएँ काँपने लगीं। बच्चे डर गए। नंद बाबा और यशोदा माँ घबराए। सब कृष्ण के पास आए। कहा — 'कन्हैया, अब क्या होगा?'
कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने गोवर्धन पर्वत की ओर देखा। फिर उन्होंने अपनी एक छोटी-सी उँगली — कनिष्ठा — से पर्वत उठा लिया। पर्वत एक विशाल छाते की तरह ऊपर उठ गया।
भागवत पुराण कहता है — कृष्ण सात दिन और सात रात खड़े रहे। पर्वत थामे रहे। सारा गोकुल उस पर्वत की छाँव में था — इंसान, गाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग — सब सुरक्षित।
इंद्र की वर्षा रुकती न थी। पर गोकुल पर एक बूँद भी नहीं पड़ी। सातवें दिन इंद्र ने थककर वर्षा रोकी। आकाश साफ हुआ। धूप निकली।
कृष्ण ने पर्वत धीरे से वापस रख दिया। गोकुल के लोग दौड़कर आए। यशोदा माँ ने कृष्ण को गले से लगाया। नंद बाबा की आँखें भर आईं। गाएँ कृष्ण के पास आकर उनके चारों ओर घूमने लगीं।
भागवत पुराण के अनुसार बाद में इंद्र स्वयं कृष्ण के पास आए। उन्होंने माथा टेका। कहा — 'मेरी भूल थी।' कृष्ण ने इंद्र को भी क्षमा कर दिया। उस दिन से गोकुल में गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हुई — जो आज भी कार्तिक मास में मनाई जाती है।