इस भाग में विष्णु सहस्रनाम की नाम-माला का अन्त और फल-श्रुति का आरम्भ है। वैशम्पायन ऋषि बताते हैं कि इन सहस्र नामों का नित्य श्रवण-कीर्तन कल्याणकारी है।
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
71
वनमाली गदी शार्ङ्गी शंखी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥
वनमाली
वनमाला (वैजयन्ती माला) धारण करने वाले
गदी
गदा धारी
शार्ङ्गी
शार्ङ्ग धनुष धारी
शंखी
शंख धारी
चक्री
चक्र धारी
नन्दकी
नन्दक खड्ग धारी
श्रीमान्
लक्ष्मी-सहित
नारायणः
सब जीवों का आश्रय
विष्णुः
सर्वव्यापी
वासुदेवः
वसुदेव-पुत्र — सबमें बसने वाले
अभिरक्षतु
हमारी रक्षा करें
यह फल-श्रुति का आरम्भ है। वनमाला, गदा, शार्ङ्ग, शंख, चक्र और नन्दक खड्गधारी, लक्ष्मी-सहित भगवान नारायण, विष्णु, वासुदेव सबकी रक्षा करें।
72
श्रीवैशम्पायन उवाच —
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥
इतीदम्
इस प्रकार यह
कीर्तनीयस्य
कीर्तन करने योग्य
केशवस्य
केशव (श्रीकृष्ण) के
महात्मनः
महान आत्मा वाले
नाम्नां सहस्रम्
एक हज़ार नामों का
दिव्यानाम्
दिव्य
अशेषेण
सम्पूर्ण रूप से
प्रकीर्तितम्
कहा गया
वैशम्पायन ऋषि कहते हैं — इस प्रकार कीर्तन योग्य, महात्मा केशव के एक हज़ार दिव्य नामों का सम्पूर्ण वर्णन किया गया।
73
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥
य इदम्
जो इसे
शृणुयात्
सुने
नित्यम्
प्रतिदिन
परिकीर्तयेत्
कीर्तन करे
न अशुभम्
कोई अशुभ नहीं
प्राप्नुयात्
प्राप्त हो
सः अमुत्र इह च
उसे इस लोक और परलोक में
मानवः
मनुष्य
जो मनुष्य इसे प्रतिदिन सुने या कीर्तन करे, उसे इस लोक और परलोक में कोई अशुभ नहीं होता।
74
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥
वेदान्तगः
वेदान्त को प्राप्त
ब्राह्मणः
ब्राह्मण
क्षत्रियः
क्षत्रिय
विजयी
विजय प्राप्त करे
वैश्यः
वैश्य
धनसमृद्धः
धन से समृद्ध
शूद्रः
शूद्र
सुखम् अवाप्नुयात्
सुख प्राप्त करे
भीष्म कहते हैं — ब्राह्मण को वेदान्त-ज्ञान, क्षत्रिय को विजय, वैश्य को धन-समृद्धि और शूद्र को सुख प्राप्त होता है।
75
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाम् ॥
धर्मार्थी
धर्म चाहने वाला
धर्मम्
धर्म प्राप्त करे
अर्थार्थी
धन चाहने वाला
अर्थम्
धन प्राप्त करे
कामी
कामना करने वाला
कामान्
इच्छित वस्तु
प्रजार्थी
संतान चाहने वाला
प्रजाम्
संतान प्राप्त करे
धर्म चाहने वाले को धर्म, धन चाहने वाले को धन, कामनाओं वाले को इच्छित वस्तु और संतान चाहने वाले को संतान प्राप्त होती है।
76
भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥
भक्तिमान्
भक्तियुक्त
सदा उत्थाय
प्रतिदिन उठकर
शुचिः
पवित्र होकर
तद्गतमानसः
उनमें मन लगाकर
सहस्रम्
एक हज़ार
वासुदेवस्य
वासुदेव के
नाम्नाम्
नामों का
प्रकीर्तयेत्
कीर्तन करे
जो भक्तियुक्त मनुष्य प्रतिदिन उठकर, पवित्र होकर, भगवान में मन लगाकर वासुदेव के सहस्र नामों का कीर्तन करे — उसका वर्णन आगे के श्लोकों में है।
77
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥
यशः
कीर्ति
विपुलम्
विशाल
ज्ञातिप्राधान्यम्
परिवार में प्रधानता
अचलां श्रियम्
अचल लक्ष्मी
श्रेयः
कल्याण
अनुत्तमम्
सर्वोत्तम
उसे विशाल यश, परिवार में प्रधानता, अचल लक्ष्मी और सर्वोत्तम कल्याण प्राप्त होता है।
78
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान् बलरूपगुणान्वितः ॥
न भयम्
भय नहीं
क्वचित्
कहीं भी
वीर्यम्
पराक्रम
तेजः
तेज
विन्दति
प्राप्त करता है
अरोगः
रोगरहित
द्युतिमान्
कान्तिमान
बलरूपगुणान्वितः
बल, रूप और गुणों से युक्त
उसे कहीं भी भय नहीं होता, पराक्रम और तेज प्राप्त होता है। वह रोगमुक्त, कान्तिमान और बल-रूप-गुणों से सम्पन्न हो जाता है।
79
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥
रोगार्तः
रोग से पीड़ित
मुच्यते
मुक्त होता है
रोगात्
रोग से
बद्धः
बन्दी
बन्धनात्
बन्धन से
भयात्
भय से
भीतः
भयभीत
आपन्नः
विपत्ति में पड़ा
आपदः
विपत्ति से
रोगी रोग से, बन्दी बन्धन से, भयभीत भय से और विपत्ति में पड़ा व्यक्ति विपत्ति से मुक्त हो जाता है।
80
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥
दुर्गाणि
कठिनाइयाँ
अतितरति
पार कर जाता है
आशु
शीघ्र
पुरुषः
मनुष्य
पुरुषोत्तमम्
पुरुषोत्तम (भगवान) को
स्तुवन्
स्तुति करता हुआ
नामसहस्रेण
सहस्र नामों से
नित्यम्
प्रतिदिन
भक्तिसमन्वितः
भक्ति से युक्त
जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पुरुषोत्तम भगवान की सहस्र नामों से स्तुति करता है, वह सब कठिनाइयों को शीघ्र पार कर जाता है।
संदर्भ
विष्णु सहस्रनाम · 8 / 11