इस भाग में भगवान के भक्तवत्सल, वासुदेव, ब्रह्म, विश्वमूर्ति, लोकनाथ, सुलभ आदि नामों का वर्णन है। ये नाम उनकी भक्तों के प्रति कृपा, सर्वव्यापकता और अनेक अवतारों को दर्शाते हैं।
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
41
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ॥
लोकबन्धुः
सब लोकों के बन्धु — सबके मित्र
लोकनाथः
सब लोकों के स्वामी
माधवः
लक्ष्मीपति — मधु-वंशी
भक्तवत्सलः
भक्तों से स्नेह रखने वाले
सुवर्णवर्णः
सुवर्ण (सोने) के समान वर्ण वाले
हेमाङ्गः
स्वर्ण-सदृश अंगों वाले
वराङ्गः
श्रेष्ठ अंगों वाले
चन्दनाङ्गदी
चन्दन और बाजूबन्द धारण करने वाले
भगवान सब लोकों के बन्धु, स्वामी और भक्तों से विशेष स्नेह रखने वाले हैं। वे सुवर्ण-वर्ण, स्वर्ण-सदृश अंगों वाले और चन्दन-अङ्गद से शोभित हैं।
42
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ।
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ॥
वीरहा
वीर असुरों का वध करने वाले
विषमः
अतुलनीय — जिनके समान कोई नहीं
शून्यः
गुणातीत — निर्गुण
घृताशीः
घृत-आहुति रूप आशीर्वाद वाले
अचलः
अविचल — स्थिर
चलः
वायु रूप में सर्वत्र गतिशील
अमानी
अहंकार-रहित
मानदः
भक्तों को मान देने वाले
मान्यः
सबसे माननीय
लोकस्वामी
लोकों के स्वामी
त्रिलोकधृक्
तीनों लोकों को धारण करने वाले
भगवान अतुलनीय, निर्गुण और अविचल हैं। वे अहंकार-रहित होते हुए भक्तों को मान देते हैं। वे सबसे माननीय, लोकों के स्वामी और त्रिलोकधारी हैं।
43
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥
सुमेधाः
उत्तम बुद्धि वाले
मेधजः
यज्ञ से प्रकट होने वाले
धन्यः
सबसे धन्य — कृतार्थ
सत्यमेधाः
सत्य बुद्धि वाले
धराधरः
पृथ्वी को धारण करने वाले
तेजोवृषः
तेज की वर्षा करने वाले
द्युतिधरः
कान्ति धारण करने वाले
सर्वशस्त्रभृतां वरः
सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ
भगवान उत्तम और सत्य बुद्धि वाले, यज्ञ से प्रकट होने वाले और सबसे धन्य हैं। वे पृथ्वी के धारक, तेज बरसाने वाले, कान्तिमान और सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं।
44
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ॥
प्रग्रहः
भक्तों को ग्रहण करने वाले
निग्रहः
दुष्टों का दमन करने वाले
व्यग्रः
सृष्टि-कार्य में व्यस्त
नैकशृङ्गः
अनेक शृङ्गों (सींगों) वाले — मत्स्य/वराह अवतार
गदाग्रजः
गदाधर — गदा के स्वामी
चतुर्मूर्तिः
चार रूपों वाले
चतुर्बाहुः
चार भुजाओं वाले
चतुर्व्यूहः
चार व्यूहों में स्थित
चतुर्गतिः
चार गतियों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) के दाता
भगवान भक्तों को स्वीकार करते हैं और दुष्टों का दमन करते हैं। वे मत्स्य-वराह अवतार में अनेक शृङ्गों वाले, गदाधर, चार भुजाओं वाले और चार पुरुषार्थों के दाता हैं।
45
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ।
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ॥
चतुरात्मा
चार आत्माओं (व्यूहों) में स्थित
चतुर्भावः
चार भावों (धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य) वाले
चतुर्वेदवित्
चारों वेदों के ज्ञाता
एकपात्
एक चरण से विश्व को व्याप्त करने वाले
समावर्तः
संसार-चक्र को चलाने वाले
अनिवृत्तात्मा
जिनकी आत्मा कभी निवृत्त (थकी) नहीं होती
दुर्जयः
जिन्हें जीतना असम्भव
दुरतिक्रमः
जिनकी आज्ञा का उल्लंघन असम्भव
भगवान चार व्यूहों में स्थित, चारों वेदों के ज्ञाता और एक पग से विश्व व्याप्त करने वाले हैं। उनकी आत्मा कभी थकती नहीं, उन्हें जीतना और उनकी आज्ञा का उल्लंघन असम्भव है।
46
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ॥
दुर्लभः
कठिनता से प्राप्त होने वाले
दुर्गमः
जिन तक पहुँचना कठिन
दुर्गः
दुर्ग-स्वरूप — अभेद्य
दुरावासः
जिनमें निवास करना कठिन — योगियों को भी दुर्लभ
दुरारिहा
दुष्ट शत्रुओं का नाश करने वाले
शुभाङ्गः
शुभ (सुन्दर) अंगों वाले
लोकसारङ्गः
लोक का सार ग्रहण करने वाले
सुतन्तुः
सुन्दर विस्तार वाले — सृष्टि का सूत्र
तन्तुवर्धनः
सृष्टि-तन्तु को बढ़ाने वाले
भगवान दुर्लभ हैं, उन तक पहुँचना कठिन है, वे अभेद्य दुर्ग और दुष्ट-शत्रु-नाशक हैं। वे शुभ अंगों वाले, लोक के सार-ग्राहक और सृष्टि-विस्तार करने वाले हैं।
47
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ॥
इन्द्रकर्मा
इन्द्र के समान कर्म करने वाले
महाकर्मा
महान कर्म करने वाले
कृतकर्मा
जिन्होंने सब कर्म किये हैं
कृतागमः
शास्त्रों के रचयिता
उद्भवः
सबकी उत्पत्ति के कारण
सुन्दरः
परम सुन्दर
सुन्दः
अत्यन्त कोमल — करुणामय
रत्ननाभः
रत्न-सदृश नाभि वाले
सुलोचनः
सुन्दर नेत्रों वाले
भगवान इन्द्र-तुल्य और उससे भी महान कर्म करने वाले, शास्त्रों के रचयिता और सबकी उत्पत्ति के कारण हैं। वे परम सुन्दर, रत्न-नाभि और सुन्दर नेत्रों वाले हैं।
48
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ।
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ॥
अर्कः
सूर्य-स्वरूप — पूजनीय
वाजसनः
अन्न (बल) देने वाले
शृङ्गी
शृङ्ग (सींग) धारी — मत्स्य/वराह अवतार
जयन्तः
सदा विजयी
सर्ववित्
सर्वज्ञ
जयी
जय प्राप्त करने वाले
सुवर्णबिन्दुः
सुवर्ण-बिन्दु — ॐकार के मूल
अक्षोभ्यः
जिन्हें विचलित नहीं किया जा सकता
सर्ववागीश्वरेश्वरः
सब वाणी के ईश्वरों के भी ईश्वर
भगवान सूर्य-स्वरूप, अन्नदाता, सदा विजयी और सर्वज्ञ हैं। वे अविचल, ॐकार के मूल और सम्पूर्ण वाणी के परम ईश्वर हैं।
49
महाहृदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ।
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ॥
महाहृदः
महान सरोवर — अनन्त गहराई
महागर्तः
महान गर्त (गहराई) वाले
महाभूतः
महान तत्त्व — पंचभूतों से परे
महानिधिः
महान भण्डार
कुमुदः
पृथ्वी को आनन्दित करने वाले
कुन्दरः
कुन्द-पुष्प सदृश शुभ्र
कुन्दः
पृथ्वी को खण्डित करने वाले — वराह अवतार
पर्जन्यः
मेघ-स्वरूप — वर्षा करने वाले
पावनः
पवित्र करने वाले
अनिलः
वायु-स्वरूप
भगवान अनन्त गहराई के सरोवर, महान तत्त्व और अक्षय निधि हैं। वे पृथ्वी को प्रसन्न करने वाले, मेघ-स्वरूप, पवित्रकारक और वायु-स्वरूप हैं।
50
अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥
अमृतांशः
अमृत के अंश — चन्द्रमा-तुल्य शीतल
अमृतवपुः
अमृत-शरीर वाले — अमर
सर्वज्ञः
सब कुछ जानने वाले
सर्वतोमुखः
सब दिशाओं में मुख वाले
सुलभः
भक्तों को सहज ही प्राप्त होने वाले
सुव्रतः
श्रेष्ठ व्रत वाले
सिद्धः
नित्य-सिद्ध
शत्रुजित्
शत्रुओं को जीतने वाले
शत्रुतापनः
शत्रुओं को तपाने (संताप देने) वाले
भगवान अमृत-स्वरूप, सर्वज्ञ और सब दिशाओं में मुख वाले हैं। वे भक्तों को सुलभ हैं, श्रेष्ठ व्रती, नित्य-सिद्ध और शत्रुओं के विजेता व संतापक हैं।
संदर्भ
विष्णु सहस्रनाम · 5 / 11