इस भाग में भगवान के अज, अच्युत, रुद्र, जनार्दन, वामन, गोविन्द आदि नामों का वर्णन है। ये नाम उनकी सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता और करुणा को दर्शाते हैं।
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
11
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥
अजः
जन्मरहित — अजन्मा
सर्वेश्वरः
सबके ईश्वर
सिद्धः
नित्य-सिद्ध — सदा पूर्ण
सिद्धिः
सिद्धि-स्वरूप — सब साधनाओं का फल
सर्वादिः
सबके आदि कारण
अच्युतः
जो कभी अपने स्वरूप से न गिरें
वृषाकपिः
धर्म और वराह रूप वाले
अमेयात्मा
जिनकी आत्मा अपरिमेय है
सर्वयोगविनिःसृतः
सब योगों से परे — सबसे मुक्त
भगवान अजन्मा, सबके ईश्वर और नित्य-सिद्ध हैं। वे अच्युत — कभी अपने स्वरूप से नहीं गिरते। उनकी आत्मा अपरिमेय है और वे सब योगों से परे हैं।
12
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥
वसुः
सबमें निवास करने वाले — धन-स्वरूप
वसुमनाः
उदार मन वाले
सत्यः
सत्य-स्वरूप
समात्मा
सबमें समान भाव रखने वाले
सम्मितः
सबसे स्वीकृत
समः
सबके प्रति समान
अमोघः
जिनका कर्म कभी व्यर्थ न हो
पुण्डरीकाक्षः
कमल-नयन
वृषकर्मा
धर्मरूपी कर्म करने वाले
वृषाकृतिः
धर्म-स्वरूप
भगवान सबमें बसते हैं, उदार हैं, सत्य-स्वरूप हैं और सबके प्रति समान दृष्टि रखते हैं। उनका कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता। वे कमलनयन और धर्म-स्वरूप हैं।
13
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥
रुद्रः
संसार-दुख दूर करने वाले
बहुशिराः
अनेक शिरों वाले — विश्वरूप
बभ्रुः
सबको धारण करने वाले
विश्वयोनिः
विश्व के उत्पत्ति-स्थान
शुचिश्रवाः
पवित्र कीर्ति वाले
अमृतः
अमर — मृत्युरहित
शाश्वतस्थाणुः
सदा स्थिर रहने वाले
वरारोहः
श्रेष्ठ गति वाले
महातपाः
महान तपस्वी — परम तेजस्वी
भगवान रुद्र रूप में दुख का नाश करते हैं, विश्वरूप में अनेक शिरों वाले हैं, विश्व के मूल कारण और पवित्र यश वाले हैं। वे अमर, सदा स्थिर और परम तेजस्वी हैं।
14
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥
सर्वगः
सर्वव्यापी
सर्ववित्
सर्वज्ञ
भानुः
प्रकाश-स्वरूप — सूर्य समान
विष्वक्सेनः
जिनकी सेना सब दिशाओं में है
जनार्दनः
दुष्टों को दण्ड देने वाले
वेदः
वेद-स्वरूप
वेदवित्
वेद के ज्ञाता
अव्यङ्गः
पूर्ण — किसी अंग की कमी से रहित
वेदाङ्गः
वेद जिनके अंग हैं
कविः
सर्वद्रष्टा कवि — क्रान्तदर्शी
भगवान सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और प्रकाश-स्वरूप हैं। वे दुष्टजनों को दण्ड देने वाले जनार्दन, वेद-स्वरूप और वेदों के ज्ञाता हैं।
15
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥
लोकाध्यक्षः
सब लोकों के अध्यक्ष
सुराध्यक्षः
देवताओं के अध्यक्ष
धर्माध्यक्षः
धर्म के अध्यक्ष
कृताकृतः
कार्य और कारण दोनों स्वरूप
चतुरात्मा
चार रूपों वाली आत्मा
चतुर्व्यूहः
चार व्यूहों में प्रकट होने वाले
चतुर्दंष्ट्रः
चार दाढ़ों वाले — नरसिंह रूप
चतुर्भुजः
चार भुजाओं वाले
भगवान लोकों, देवताओं और धर्म के अध्यक्ष हैं। वे चार व्यूहों में प्रकट होते हैं, नरसिंह रूप में चार दाढ़ों वाले और चतुर्भुज हैं।
16
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥
भ्राजिष्णुः
स्वयं प्रकाशमान
भोजनम्
भोग्य पदार्थ स्वरूप
भोक्ता
सबका भोग करने वाले
सहिष्णुः
सब कुछ सहन करने वाले
जगदादिजः
जगत से पूर्व विद्यमान
अनघः
पापरहित — निर्दोष
विजयः
सदा विजयी
जेता
सबको जीतने वाले
विश्वयोनिः
विश्व की उत्पत्ति का कारण
पुनर्वसुः
बार-बार अवतार लेने वाले
भगवान स्वयं प्रकाशमान, भोग्य और भोक्ता दोनों हैं। वे अत्यन्त क्षमाशील, पापरहित, सदा विजयी और बार-बार अवतार लेने वाले हैं।
17
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥
उपेन्द्रः
इन्द्र के छोटे भाई — वामन रूप
वामनः
वामन अवतार
प्रांशुः
अत्यन्त ऊँचे — विराट रूप
अमोघः
जिनका संकल्प कभी व्यर्थ न हो
शुचिः
परम पवित्र
ऊर्जितः
अत्यन्त बलवान
अतीन्द्रः
इन्द्रियों से परे
सङ्ग्रहः
सबको अपने में समेटने वाले
सर्गः
सृष्टि-स्वरूप
धृतात्मा
स्वयं में स्थित
नियमः
नियम-स्वरूप
यमः
सबको नियंत्रित करने वाले
भगवान ने वामन रूप में अवतार लेकर तीन पगों से तीनों लोक नाप लिए। वे पवित्र, अत्यन्त बलवान, इन्द्रियातीत और सम्पूर्ण सृष्टि की व्यवस्था के मूल हैं।
18
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥
वेद्यः
जानने योग्य — ज्ञेय
वैद्यः
संसार-रोग के परम चिकित्सक
सदायोगी
सदा योग में स्थित
वीरहा
वीर दैत्यों का नाश करने वाले
माधवः
लक्ष्मीपति
मधुः
मधु समान मधुर
अतीन्द्रियः
इन्द्रियों से परे
महामायः
महान माया के स्वामी
महोत्साहः
महान उत्साह वाले
महाबलः
महान बलशाली
भगवान ज्ञेय हैं, संसार-रोग के परम वैद्य हैं और सदा योग में स्थित रहते हैं। वे दैत्यों के नाशक, माया के स्वामी, इन्द्रियातीत और महाबलशाली हैं।
19
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥
महाबुद्धिः
महान बुद्धि वाले
महावीर्यः
महान पराक्रम वाले
महाशक्तिः
महान शक्ति वाले
महाद्युतिः
महान तेज वाले
अनिर्देश्यवपुः
जिनके स्वरूप का वर्णन न हो सके
श्रीमान्
लक्ष्मी-सहित — शोभायमान
अमेयात्मा
अपरिमित आत्मा वाले
महाद्रिधृक्
महान पर्वत को धारण करने वाले
भगवान की बुद्धि, वीर्य, शक्ति और तेज — सब महान हैं। उनके स्वरूप का वर्णन असम्भव है। वे लक्ष्मी-सहित, अपरिमित आत्मा वाले और पर्वतधारी हैं।
20
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥
महेष्वासः
महान धनुर्धर
महीभर्ता
पृथ्वी का भरण करने वाले
श्रीनिवासः
जिनमें लक्ष्मी सदा निवास करती हैं
सतां गतिः
सज्जनों की परम गति
अनिरुद्धः
जिन्हें कोई रोक न सके
सुरानन्दः
देवताओं को आनन्द देने वाले
गोविन्दः
गौओं, भूमि और वाणी के स्वामी
गोविदां पतिः
वेदवेत्ताओं के स्वामी
भगवान महान धनुर्धर, पृथ्वी के पालक, श्रीनिवास और सज्जनों की गति हैं। उन्हें कोई रोक नहीं सकता। वे गोविन्द और वेदवेत्ताओं के स्वामी हैं।
संदर्भ
विष्णु सहस्रनाम · 2 / 11