📿 विष्णु सहस्रनाम

श्लोक 21–30

विष्णु सहस्रनाम · 3 / 11
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
21
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥
मरीचिः
किरण-स्वरूप — प्रकाश की रेखा
दमनः
दुष्टों का दमन करने वाले
हंसः
हंस-स्वरूप — ज्ञान-विवेक के प्रतीक
सुपर्णः
सुन्दर पंखों वाले — गरुड़ध्वज
भुजगोत्तमः
सर्पों में श्रेष्ठ — शेषनाग पर शयन करने वाले
हिरण्यनाभः
सुवर्ण-नाभि वाले
सुतपाः
श्रेष्ठ तप करने वाले
पद्मनाभः
कमल-नाभि वाले
प्रजापतिः
प्रजा के पालक
भगवान प्रकाश की किरण हैं, दुष्टों का दमन करते हैं, हंस की भाँति विवेकी हैं। वे शेषनाग पर शयन करने वाले, सुवर्ण-नाभि और कमल-नाभि वाले प्रजापति हैं।
22
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥
अमृत्युः
मृत्युरहित — अमर
सर्वदृक्
सब कुछ देखने वाले
सिंहः
सिंह-स्वरूप — पराक्रमी
सन्धाता
सबको जोड़ने वाले — कर्मफल से जोड़ने वाले
सन्धिमान्
सबसे युक्त — सम्पन्न
स्थिरः
सदा स्थिर
अजः
अजन्मा
दुर्मर्षणः
जिन्हें सहना कठिन हो — अपराजेय
शास्ता
सबको शासन करने वाले
विश्रुतात्मा
जिनकी आत्मा (कीर्ति) सर्वत्र विख्यात है
सुरारिहा
देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले
भगवान मृत्युरहित, सर्वद्रष्टा और सिंह समान पराक्रमी हैं। वे अजन्मा, अपराजेय, सबके शासक और सर्वत्र विख्यात आत्मा वाले हैं। वे देवशत्रुओं का नाश करते हैं।
23
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥
गुरुः
सबके गुरु — शिक्षक
गुरुतमः
सबसे बड़े गुरु
धाम
परम धाम — तेज-स्वरूप
सत्यः
सत्य-स्वरूप
सत्यपराक्रमः
सत्य पराक्रम वाले
निमिषः
आँखें बन्द करने वाले — प्रलयकर्ता
अनिमिषः
सदा जागरूक — पलक न झपकने वाले
स्रग्वी
वनमाला धारण करने वाले
वाचस्पतिः
वाणी के स्वामी
उदारधीः
उदार बुद्धि वाले
भगवान सबके गुरु, परम धाम और सत्य-स्वरूप हैं। वे सदा जागरूक, वनमाला धारी, वाणी के स्वामी और उदार बुद्धि वाले हैं।
24
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥
अग्रणीः
सबसे आगे चलने वाले — नेता
ग्रामणीः
समूह के नायक
श्रीमान्
लक्ष्मी-सहित
न्यायः
न्याय-स्वरूप
नेता
सबके नेता — मार्गदर्शक
समीरणः
प्राणवायु-स्वरूप
सहस्रमूर्धा
सहस्र (अनन्त) मस्तकों वाले
विश्वात्मा
विश्व की आत्मा
सहस्राक्षः
सहस्र नेत्रों वाले
सहस्रपात्
सहस्र चरणों वाले
भगवान सबके अग्रणी, न्याय-स्वरूप और मार्गदर्शक हैं। पुरुषसूक्त की भाँति वे सहस्र मस्तकों, सहस्र नेत्रों और सहस्र चरणों वाले विश्वात्मा हैं।
25
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥
आवर्तनः
संसार-चक्र को चलाने वाले
निवृत्तात्मा
संसार से निवृत्त आत्मा वाले
संवृतः
माया से ढके हुए — अव्यक्त
सम्प्रमर्दनः
शत्रुओं को कुचलने वाले
अहः संवर्तकः
दिन-रात का चक्र चलाने वाले
वह्निः
अग्नि-स्वरूप
अनिलः
वायु-स्वरूप — प्राणवायु
धरणीधरः
पृथ्वी को धारण करने वाले
भगवान संसार-चक्र को चलाते हैं पर स्वयं संसार से परे हैं। वे शत्रुओं का मर्दन करने वाले, अग्नि और वायु स्वरूप, तथा पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।
26
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥
सुप्रसादः
अत्यन्त प्रसन्न — कृपालु
प्रसन्नात्मा
प्रसन्न आत्मा वाले
विश्वधृक्
विश्व को धारण करने वाले
विश्वभुक्
विश्व का भोग करने वाले — पालक
विभुः
सर्वव्यापक प्रभु
सत्कर्ता
सत्कार करने वाले
सत्कृतः
सबसे सत्कृत — पूजित
साधुः
सज्जन — धर्मात्मा
जह्नुः
जीवों को माया से छिपाने वाले
नारायणः
नारों (जीवों) का आश्रय
नरः
नित्य पुरुष — अविनाशी
भगवान अत्यन्त कृपालु, प्रसन्न आत्मा वाले और विश्व के धारक-पालक हैं। वे सज्जन, सबसे पूजित, नारायण (सब जीवों के आश्रय) और नित्य पुरुष हैं।
27
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥
असंख्येयः
जिन्हें गिना न जा सके — अनन्त
अप्रमेयात्मा
जिनकी आत्मा अप्रमेय है
विशिष्टः
सबसे विशिष्ट — अद्वितीय
शिष्टकृत्
शिष्ट (सज्जन) बनाने वाले
शुचिः
परम पवित्र
सिद्धार्थः
जिनके सब अर्थ सिद्ध हैं
सिद्धसंकल्पः
जिनका संकल्प सदा सिद्ध होता है
सिद्धिदः
सिद्धि प्रदान करने वाले
सिद्धिसाधनः
सिद्धि का साधन स्वयं
भगवान असंख्य, अप्रमेय और अद्वितीय हैं। वे सज्जनता के निर्माता, परम पवित्र, सदा सिद्ध संकल्प वाले और भक्तों को सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।
28
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥
वृषाही
धर्म-रूपी दिन वाले
वृषभः
धर्म में श्रेष्ठ — वृषभ (बैल) समान बलवान
विष्णुः
सर्वव्यापी
वृषपर्वा
धर्म ही जिनकी सीढ़ी है
वृषोदरः
धर्म को उदर में धारण करने वाले
वर्धनः
सबकी वृद्धि करने वाले
वर्धमानः
सदा बढ़ने वाले — असीम
विविक्तः
सबसे पृथक — विलक्षण
श्रुतिसागरः
वेदों के सागर — सम्पूर्ण श्रुति जिनमें समाई है
भगवान धर्म में श्रेष्ठ, सर्वव्यापी विष्णु, सबकी वृद्धि करने वाले और सदा बढ़ते रहने वाले हैं। वे सबसे विलक्षण और वेदों के सागर हैं।
29
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥
सुभुजः
सुन्दर भुजाओं वाले
दुर्धरः
जिन्हें धारण करना कठिन हो — ध्यान में भी दुर्लभ
वाग्मी
वाक्पटु — सुन्दर वाणी वाले
महेन्द्रः
इन्द्र के भी ईश्वर
वसुदः
धन देने वाले
वसुः
स्वयं धन-स्वरूप
नैकरूपः
अनेक रूपों वाले
बृहद्रूपः
विराट रूप वाले
शिपिविष्टः
किरणों में व्याप्त
प्रकाशनः
सबको प्रकाशित करने वाले
भगवान सुन्दर भुजाओं वाले, वाक्पटु, इन्द्र के भी स्वामी और धनदाता हैं। वे अनेक रूप धारण करते हैं, विराट रूप वाले, किरणों में व्याप्त और सबको प्रकाशित करने वाले हैं।
30
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः
ओज, तेज और द्युति (कान्ति) धारण करने वाले
प्रकाशात्मा
प्रकाश-स्वरूप आत्मा
प्रतापनः
सबको तपाने वाले — तेजस्वी
ऋद्धः
सब सम्पत्तियों से पूर्ण
स्पष्टाक्षरः
जिनका अक्षर (ॐ) स्पष्ट है
मन्त्रः
मन्त्र-स्वरूप — वेदमन्त्र
चन्द्रांशुः
चन्द्रमा की किरणों जैसे शीतल
भास्करद्युतिः
सूर्य के समान प्रकाशमान
भगवान ओज, तेज और कान्ति से युक्त, प्रकाश-स्वरूप और तेजस्वी हैं। वे सब सम्पत्तियों से पूर्ण, ॐकार-स्वरूप, चन्द्रमा सी शीतलता और सूर्य सा तेज रखने वाले हैं।

इस भाग में भगवान के हंस, गुरु, नारायण, सहस्रमूर्धा आदि नामों का वर्णन है। ये नाम उनके विश्वरूप, सर्वव्यापकता और कृपालुता को दर्शाते हैं।

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