भीष्म पितामह ने बाणों की शैय्या पर लेटे हुए युधिष्ठिर को विष्णु सहस्रनाम सुनाया था। महाभारत के अनुशासन पर्व में यह प्रसंग आता है। युधिष्ठिर ने पूछा — संसार में सबसे बड़ा धर्म क्या है, किसके स्मरण से जीव दुखों से मुक्त होता है? उत्तर में भीष्म ने भगवान विष्णु के सहस्र (एक हज़ार) नामों का गान किया।
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
1
विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥
विश्वम्
सम्पूर्ण विश्व — जो सब में व्याप्त हैं
विष्णुः
सर्वव्यापी — जो सर्वत्र विद्यमान हैं
वषट्कारः
जिनके लिए यज्ञ में वषट्कार किया जाता है
भूतभव्यभवत्प्रभुः
भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी
भूतकृत्
सम्पूर्ण प्राणियों के रचयिता
भूतभृत्
सब प्राणियों का भरण-पोषण करने वाले
भावः
स्वयं सत्तारूप — शुद्ध अस्तित्व
भूतात्मा
सब प्राणियों की आत्मा
भूतभावनः
सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाले
इस श्लोक में विष्णु के नौ नाम आते हैं। ये नाम बताते हैं कि भगवान ही सम्पूर्ण विश्व हैं, सर्वत्र व्याप्त हैं, तीनों कालों के स्वामी हैं, सब प्राणियों के रचयिता, पालनकर्ता और आत्मा हैं।
2
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥
पूतात्मा
पवित्र आत्मा वाले — सर्वथा शुद्ध
परमात्मा
सर्वोच्च आत्मा — सबसे परे
मुक्तानां परमा गतिः
मुक्त जीवों की सर्वोच्च गति
अव्ययः
जिनका कभी क्षय नहीं होता
पुरुषः
शरीर-नगर में निवास करने वाले
साक्षी
सबको देखने वाले — साक्षात् द्रष्टा
क्षेत्रज्ञः
शरीर-रूपी क्षेत्र को जानने वाले
अक्षरः
अविनाशी — जो कभी नष्ट न हों
यहाँ भगवान को पवित्रतम आत्मा, सबसे परे परमात्मा, और मुक्त जीवों की अंतिम गति बताया गया है। वे अविनाशी, सबके साक्षी और शरीर-क्षेत्र के ज्ञाता हैं।
3
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥
योगः
योग स्वरूप — ध्यान से प्राप्त होने वाले
योगविदां नेता
योगियों के मार्गदर्शक
प्रधानपुरुषेश्वरः
प्रकृति और पुरुष दोनों के ईश्वर
नारसिंहवपुः
नरसिंह रूप धारण करने वाले
श्रीमान्
लक्ष्मी से सदा युक्त — शोभायमान
केशवः
सुन्दर केशों वाले, या ब्रह्मा-विष्णु-शिव के स्वामी
पुरुषोत्तमः
पुरुषों में सर्वोत्तम
भगवान योगियों के नेता, प्रकृति-पुरुष दोनों के स्वामी, और नरसिंह अवतार लेने वाले हैं। वे लक्ष्मी-सहित केशव और सबसे उत्तम पुरुष हैं।
4
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥
सर्वः
सब कुछ — सम्पूर्ण
शर्वः
संहारकर्ता — प्रलय करने वाले
शिवः
कल्याणकारी — मंगलमय
स्थाणुः
स्थिर — अचल
भूतादिः
प्राणियों के आदि कारण
निधिः अव्ययः
अक्षय निधि — कभी न घटने वाला भण्डार
सम्भवः
स्वेच्छा से प्रकट होने वाले
भावनः
सबको उत्पन्न करने वाले
भर्ता
सबका भरण करने वाले
प्रभवः
सबकी उत्पत्ति के मूल
प्रभुः
समर्थ स्वामी
ईश्वरः
सर्वशक्तिमान नियंता
इस श्लोक में भगवान को सम्पूर्ण, संहारकर्ता, कल्याणकारी, स्थिर, प्राणियों के मूल कारण, अक्षय निधि, स्वेच्छा से अवतरित होने वाले, पालनकर्ता और सर्वशक्तिमान ईश्वर बताया गया है।
5
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥
स्वयम्भूः
स्वयं प्रकट होने वाले — अजन्मा
शम्भुः
सुख देने वाले — आनन्दप्रद
आदित्यः
अदिति के पुत्र — सूर्य समान तेजस्वी
पुष्कराक्षः
कमल के समान नेत्र वाले
महास्वनः
भव्य ध्वनि वाले — वेदवाणी स्वरूप
अनादिनिधनः
जिनका न आदि है न अंत
धाता
सबको धारण करने वाले
विधाता
सबकी विधि (भाग्य) रचने वाले
धातुरुत्तमः
सबसे श्रेष्ठ आधार — सर्वोत्तम धातु
भगवान स्वयं प्रकट होते हैं, सुखदाता हैं, कमलनयन हैं। उनका न आदि है न अंत। वे सबको धारण करते हैं, सबका भाग्य रचते हैं और सबसे श्रेष्ठ आधार हैं।
6
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥
अप्रमेयः
जिन्हें प्रमाणों से नापा न जा सके
हृषीकेशः
इन्द्रियों के स्वामी
पद्मनाभः
जिनकी नाभि से कमल निकला
अमरप्रभुः
देवताओं के भी स्वामी
विश्वकर्मा
सम्पूर्ण विश्व के रचयिता
मनुः
विचारशील — मनन करने वाले
त्वष्टा
सबके आकार गढ़ने वाले
स्थविष्ठः
सबसे विशाल
स्थविरः
सनातन — चिरन्तन
ध्रुवः
स्थिर — अटल
भगवान अप्रमेय हैं — किसी प्रमाण से उन्हें जाना नहीं जा सकता। वे इन्द्रियों के स्वामी, पद्मनाभ, विश्व के रचयिता, सबसे विशाल और सनातन अटल सत्ता हैं।
7
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥
अग्राह्यः
जो इन्द्रियों की पकड़ से परे हैं
शाश्वतः
सदा रहने वाले — नित्य
कृष्णः
श्यामवर्ण — सत्-चित्-आनन्दमय
लोहिताक्षः
लाल नेत्रों वाले
प्रतर्दनः
प्रलय में सबका संहार करने वाले
प्रभूतः
सब विभूतियों से सम्पन्न
त्रिककुब्धाम
तीनों लोकों का निवास
पवित्रम्
सबसे पवित्र — शुद्धिकारक
मङ्गलं परम्
परम मंगलमय
भगवान इन्द्रियों से परे हैं, शाश्वत हैं, कृष्ण-वर्ण हैं। वे प्रलयकर्ता, सब विभूतियों से पूर्ण, तीनों लोकों के आश्रय और परम पवित्र मंगल-स्वरूप हैं।
8
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥
ईशानः
सबके नियंता — ईश्वर
प्राणदः
प्राण देने वाले
प्राणः
स्वयं प्राण-स्वरूप
ज्येष्ठः
सबसे बड़े — सबसे प्राचीन
श्रेष्ठः
सबसे उत्तम
प्रजापतिः
सम्पूर्ण प्रजा के पालक
हिरण्यगर्भः
सुवर्ण-अण्ड में निवास करने वाले सृष्टिकर्ता
भूगर्भः
पृथ्वी को गर्भ में धारण करने वाले
माधवः
लक्ष्मी के पति — माया के स्वामी
मधुसूदनः
मधु दैत्य का वध करने वाले
भगवान सबके नियंता, प्राणदाता, सबसे प्राचीन और श्रेष्ठ हैं। वे सृष्टि के मूल हिरण्यगर्भ, पृथ्वी को धारण करने वाले, लक्ष्मीपति माधव और मधु दैत्य के संहारक मधुसूदन हैं।
9
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥
ईश्वरः
सर्वशक्तिमान प्रभु
विक्रमी
पराक्रमी — वामन रूप में तीन पग रखने वाले
धन्वी
शार्ङ्ग धनुषधारी
मेधावी
सर्वज्ञ — परम बुद्धिमान
विक्रमः
शौर्य-स्वरूप
क्रमः
सबकी गति — क्रम-स्वरूप
अनुत्तमः
जिनसे उत्तम कोई नहीं
दुराधर्षः
जिन्हें कोई पराजित न कर सके
कृतज्ञः
भक्तों के कर्म को जानने-मानने वाले
कृतिः
सम्पूर्ण कर्म-स्वरूप
आत्मवान्
आत्मस्वरूप में स्थित
भगवान सर्वशक्तिमान, पराक्रमी और शार्ङ्ग-धनुषधारी हैं। वे सर्वज्ञ, अजेय और भक्तों के छोटे-से-छोटे कर्म को भी स्मरण रखने वाले कृतज्ञ हैं।
10
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥
सुरेशः
देवताओं के ईश्वर
शरणम्
सबकी शरण — आश्रय
शर्म
परम आनन्द स्वरूप
विश्वरेताः
विश्व के बीज-कारण
प्रजाभवः
प्रजा की उत्पत्ति के मूल
अहः
दिन-स्वरूप — प्रकाशमय
संवत्सरः
काल-स्वरूप — समय के चक्र
व्यालः
सर्प की भाँति दुर्ग्राह्य
प्रत्ययः
प्रतीति (विश्वास) का आधार
सर्वदर्शनः
सब कुछ देखने वाले — सर्वद्रष्टा
भगवान देवताओं के स्वामी, सबके आश्रय और परम सुख हैं। वे विश्व के बीज, काल-स्वरूप, सबके विश्वास का आधार और सर्वद्रष्टा हैं।
संदर्भ
विष्णु सहस्रनाम · 1 / 11