ग्यारहवाँ और अन्तिम अनुवाक चमकम् का समापन है। यहाँ यज्ञ के माध्यम से धन, ऐश्वर्य, कर्म, शक्ति, सद्गति और अन्ततः शान्ति की प्रार्थना है। तीन बार 'शान्तिः' कहकर श्री रुद्रम् का पाठ सम्पूर्ण होता है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
यज्ञेन कल्पन्तां वित्तं च मे वित्तिश्च मे ।
यज्ञेन
यज्ञ के द्वारा
कल्पन्ताम्
सिद्ध हों
वित्तम्
धन
वित्तिः
धन प्राप्ति
यज्ञ के द्वारा सब सिद्ध हों — मुझे धन और धन प्राप्ति का मार्ग मिले।
मन्त्र 2
भूतं च मे भूतिश्च मे ।
भूतम्
जो हो चुका है (अतीत)
भूतिः
ऐश्वर्य (सम्पत्ति)
जो हो चुका है वह शुभ हो, और ऐश्वर्य मुझे मिले।
मन्त्र 3
वसु च मे वसतिश्च मे कर्म च मे शक्तिश्च मे ।
वसु
धन (सम्पत्ति)
वसतिः
निवास
कर्म
कर्म
शक्तिः
शक्ति
मुझे धन, उत्तम निवास, शुभ कर्म और शक्ति मिले।
मन्त्र 4
अर्थश्च म इतिश्च मे गतिश्च मे ।
अर्थः
उद्देश्य
इतिः
प्रगति
गतिः
सद्गति (मुक्ति)
मुझे जीवन का उद्देश्य स्पष्ट हो, प्रगति मिले और अन्त में सद्गति प्राप्त हो।
मन्त्र 5
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
ॐ
परब्रह्म का प्रतीक
शान्तिः शान्तिः शान्तिः
तीन बार शान्ति (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक)
ॐ — तीनों प्रकार के कष्टों (दैवी, भौतिक, आत्मिक) की शान्ति हो। शान्ति, शान्ति, शान्ति।
मन्त्र 6
यज्ञेन कल्पन्तामृतं च मे सत्यं च मे ।
इष्टं च मे पूर्तं च मे श्रीश्च मे यशश्च मे ॥
ऋतम्
ऋत (सत्य, व्यवस्था)
सत्यम्
सत्य
इष्टम्
यज्ञ-फल
पूर्तम्
दान-फल
श्रीः
श्री (लक्ष्मी)
यशः
यश
यज्ञ के द्वारा मुझे ऋत और सत्य मिले, यज्ञ और दान का फल मिले, श्री (लक्ष्मी) और यश मिले। इस प्रकार श्री रुद्रम् का चमकम् भाग सम्पूर्ण होता है।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 22 / 22