📿 श्री रुद्रम्

चमकम् — अनुवाक 10

श्री रुद्रम् · 21 / 22
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
कृत्तिश्च मे अकृत्तिश्च मे ।
कृत्तिः
कटी हुई (सिली हुई वस्तु)
अकृत्तिः
बिना कटी (प्राकृतिक वस्तु)
सिले हुए और बिना सिले वस्त्र — दोनों प्रकार की वस्तुएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 2
अश्माश्च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे ।
अश्मा
पत्थर
मृत्तिका
मिट्टी
गिरयः
पर्वत
पत्थर, मिट्टी और पर्वत — ये सब मुझे अनुकूल हों।
मन्त्र 3
पर्वताश्च मे सिकताश्च मे वनानि च मे ।
पर्वताः
पर्वत
सिकताः
बालू (रेत)
वनानि
वन
पर्वत, बालू और वन — ये सब मुझे अनुकूल हों।
मन्त्र 4
हिरण्यं चायश्च मे सीसं च मे त्रपुश्च मे ।
हिरण्यम्
सोना
अयः
लोहा
सीसम्
सीसा
त्रपुः
टिन
सोना, लोहा, सीसा और टिन — ये सब धातुएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 5
श्यामं च मे लोहं च मे अग्निश्च मे ।
श्यामम्
लोहा (काला लोहा)
लोहम्
ताँबा (लाल धातु)
अग्निः
अग्नि
काला लोहा, ताँबा और अग्नि — ये सब मुझे अनुकूल हों।
मन्त्र 6
आपश्च मे वीरुधश्च मे वनस्पतयश्च मे ।
आपः
जल
वीरुधः
लताएँ
वनस्पतयः
वृक्ष
जल, लताएँ और वृक्ष — ये सब प्रकृति के तत्त्व मुझे अनुकूल हों।

दसवें अनुवाक में पृथ्वी के भौतिक तत्त्वों — पत्थर, मिट्टी, पर्वत, वन, धातुएँ, जल — की प्रार्थना है। वैदिक ऋषि प्रकृति के हर अंश में ईश्वर को देखते हैं।

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