📖 ब्रह्मांड पुराण — बुध कौशिक ऋषि
21
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥
दूर्वादलश्यामम्
दूब की पत्ती के समान श्यामवर्ण
स्तुवन्ति
स्तुति करते हैं
नामभिः दिव्यैः
दिव्य नामों से
संसारिणः
संसार-बन्धन में बँधे
दूब जैसे श्याम, कमलनयन, पीताम्बरधारी श्रीराम की दिव्य नामों से स्तुति करने वाले संसार-बन्धन से मुक्त रहते हैं — ऐसा इस श्लोक में कहा गया है।
22
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ॥
राजमणिः
राजाओं में श्रेष्ठ
सदा विजयते
सदा विजयी रहते हैं
निशाचरचमू
राक्षसों की सेना
यह श्लोक 'रामरक्षा' की विशेष पुनरावृत्ति है जिसमें राम शब्द के विभिन्न विभक्ति-रूप प्रयुक्त हैं। राम सदा विजयी हैं और राक्षस-सेना को उन्होंने परास्त किया।
23
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् ।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥
चित्तलयः
चित्त का विलीन होना
राम से बढ़कर कोई आश्रय नहीं। मैं राम का दास हूँ। मेरा चित्त सदा राम में लीन रहे — यह समर्पण का भाव इस श्लोक में है।
24
तत्प्रभावात् अहं सर्वान् संकटान् उत्तरे सदा ।
मरणेषु अपि सर्वेषु रामरक्षा परा गतिः ॥
तत्प्रभावात्
उसके प्रभाव से
मरणेषु
मृत्यु-सम परिस्थितियों में
परा गतिः
परम गति, सर्वोत्तम आश्रय
इस स्तोत्र के प्रभाव से सभी संकटों को पार किया जाता है — मृत्यु-सम स्थितियों में भी रामरक्षा ही परम आश्रय है, ऐसा कहा गया है।
25
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा- वक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा- वग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥
आत्तसज्जधनुषा
सज्जित धनुष उठाये हुए
विषुस्पृशा
बाण को स्पर्श करते हुए
अक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ
अक्षय बाण-तरकश से युक्त
सज्जित धनुष और अक्षय बाणों से युक्त राम और लक्ष्मण मार्ग में आगे-आगे चलें — ऐसी कल्पना इस श्लोक में की गई है।
26
संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥
चापबाणधरः
धनुष-बाण धारण किये
मनोरथः
मनोरथ (इच्छा) को पूर्ण करने वाले
कवच, तलवार, धनुष-बाण से सज्जित युवा श्रीराम लक्ष्मण सहित हमारी रक्षा करें और मनोरथ पूर्ण करें — यह भाव इस श्लोक में है।
27
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥
लक्ष्मणानुचरः
लक्ष्मण जिनके अनुचर हैं
रघूत्तमः
रघुवंश में उत्तम
दशरथपुत्र, शूरवीर, बलवान, ककुत्स्थवंशी, पूर्ण पुरुष, कौसल्यानन्दन और रघुवंश-श्रेष्ठ — इन विशेषणों से श्रीराम का परिचय दिया गया है।
28
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥
वेदान्तवेद्यः
वेदान्त द्वारा जानने योग्य
पुराणपुरुषोत्तमः
पुराणों में वर्णित पुरुषोत्तम
जानकीवल्लभः
जानकी के प्रिय
अप्रमेयपराक्रमः
अप्रमेय (अमाप) पराक्रम वाले
वेदान्त द्वारा ज्ञेय, यज्ञेश्वर, पुराणपुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ, श्रीमान और अमाप पराक्रम वाले — ये श्रीराम के और विशेषण हैं।
29
इतीदं कृतवान् स्तोत्रं सर्वापद्विनिवारणम् ।
मृतसञ्जीवनं चैव रामरक्षास्तवं पठेत् ॥
सर्वापद्विनिवारणम्
सभी विपत्तियों का निवारण करने वाला
मृतसञ्जीवनम्
मृतप्राय को भी जीवित करने वाला
इस प्रकार यह स्तोत्र रचा गया है जो समस्त विपत्तियों का निवारक और मृतप्राय को भी संजीवन देने वाला कहा गया है।
30
रामरक्षामिमां हस्ते यस्तु राजन् सदा स्मरेत् ।
सर्वशत्रुविनिर्मुक्तो विजयी भवति ध्रुवम् ॥
रामरक्षाम् इमाम्
इस रामरक्षा को
सदा स्मरेत्
सदा स्मरण करे
सर्वशत्रुविनिर्मुक्तः
सब शत्रुओं से मुक्त
जो इस रामरक्षा का सदा स्मरण करता है, वह समस्त शत्रुओं से मुक्त और निश्चित रूप से विजयी होता है — ऐसा इस श्लोक में कहा गया है।
संदर्भ
श्लोक 25-26 में युद्धसज्जित राम-लक्ष्मण का चित्रण है, जो मार्ग में आगे चलकर रक्षा करते हैं। यह कवच-स्तोत्रों की एक विशेष शैली है जिसमें देवता को सशस्त्र रक्षक के रूप में कल्पित किया जाता है।
श्लोक 27-28 में राम के अनेक नाम और विशेषण एकत्र किये गये हैं — दाशरथि, काकुत्स्थ, वेदान्तवेद्य, यज्ञेश, पुराणपुरुषोत्तम आदि। ये नाम राम के विभिन्न पक्षों को उजागर करते हैं।
रामरक्षा · 3 / 4