📿 रामरक्षा स्तोत्र

श्लोक 31–38

रामरक्षा · 4 / 4
📖 ब्रह्मांड पुराण — बुध कौशिक ऋषि
31
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥
चरणौ
चरणों को
मनसा स्मरामि
मन से स्मरण करता हूँ
वचसा गृणामि
वाणी से गान करता हूँ
शिरसा नमामि
मस्तक से नमन करता हूँ
शरणं प्रपद्ये
शरण में जाता हूँ
श्रीरामचन्द्र के चरणों को मन से स्मरण करता हूँ, वाणी से गान करता हूँ, मस्तक से नमन करता हूँ और उनकी शरण में जाता हूँ। यहाँ मन-वचन-कर्म तीनों से समर्पण व्यक्त किया गया है।
32
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुः ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥
माता
माता
मत्पिता
मेरे पिता
स्वामी
स्वामी
मत्सखा
मेरे मित्र
सर्वस्वम्
सब कुछ
दयालुः
दयालु
नान्यम् जाने
अन्य किसी को नहीं जानता
राम ही माता हैं, पिता हैं, स्वामी हैं, सखा हैं और सब कुछ हैं — ऐसे दयालु रामचन्द्र के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं जानता। यह पूर्ण समर्पण का श्लोक है।
33
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥
दक्षिणे
दाहिनी ओर
लक्ष्मणः
लक्ष्मण
वामे
बाईं ओर
जनकात्मजा
जनककन्या सीता
पुरतः
सामने
मारुतिः
हनुमान
रघुनन्दनम्
रघुवंश के आनन्द
जिनके दाहिनी ओर लक्ष्मण, बाईं ओर सीता और सामने हनुमान विराजमान हैं — ऐसे रघुनन्दन को वन्दन है।
34
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥
लोकाभिरामम्
लोकों को रमाने वाले
रणरंगधीरम्
रणभूमि में धीर
राजीवनेत्रम्
कमल-नेत्र
रघुवंशनाथम्
रघुवंश के स्वामी
कारुण्यरूपम्
करुणा-स्वरूप
करुणाकरम्
करुणा के सागर
लोकों को आनन्दित करने वाले, रणभूमि में धीर, कमलनेत्र, रघुवंशनाथ, करुणास्वरूप श्रीरामचन्द्र की शरण में जाता हूँ।
35
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
मनोजवम्
मन के समान वेग वाले
मारुततुल्यवेगम्
वायु के समान गतिशील
जितेन्द्रियम्
इन्द्रियों को जीतने वाले
बुद्धिमताम् वरिष्ठम्
बुद्धिमानों में श्रेष्ठ
वातात्मजम्
वायुपुत्र
वानरयूथमुख्यम्
वानर-सेना के प्रमुख
श्रीरामदूतम्
श्रीराम के दूत
मन और वायु के समान वेगशाली, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वायुपुत्र, वानरसेनापति श्रीरामदूत हनुमान की शरण में जाता हूँ। यह प्रसिद्ध हनुमान-ध्यान श्लोक है।
36
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥
कूजन्तम्
कूकते हुए
रामरामेति
'राम-राम' ऐसे
मधुराक्षरम्
मधुर अक्षरों वाले
कविताशाखाम्
कविता की शाखा पर
आरुह्य
चढ़कर
वाल्मीकिकोकिलम्
वाल्मीकि रूपी कोयल
कविता की शाखा पर बैठकर 'राम-राम' का मधुर गान करने वाले वाल्मीकि रूपी कोयल को वन्दन है। यह श्लोक प्रारम्भ में भी आया है, यहाँ पुनः उपसंहार में दोहराया गया है।
37
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥
आपदाम् अपहर्तारम्
विपत्तियों को हरने वाले
दातारम्
देने वाले
सर्वसम्पदाम्
सब सम्पत्तियों के
लोकाभिरामम्
लोकों को रमाने वाले
भूयो भूयः
बार-बार
विपत्तियों को दूर करने वाले, सब सम्पत्तियों के दाता, संसार को आनन्दित करने वाले श्रीराम को बारम्बार नमस्कार — यह श्लोक भी पुनरावृत्ति है, जो स्तोत्र के उपसंहार में आता है।
38
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥
इति
इस प्रकार
बुधकौशिकविरचितम्
बुध कौशिक द्वारा रचित
सम्पूर्णम्
सम्पूर्ण हुआ
श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु
श्री सीतारामचन्द्र को अर्पित हो
इस प्रकार बुध कौशिक ऋषि द्वारा रचित श्री रामरक्षा स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ। इसे श्री सीतारामचन्द्र को अर्पित किया गया है।

अन्तिम खण्ड में श्लोक 31-32 पूर्ण समर्पण के भाव को व्यक्त करते हैं — मन, वचन और कर्म से रामचन्द्र की शरण। श्लोक 35 में हनुमान का प्रसिद्ध ध्यान-श्लोक सम्मिलित है।

रामरक्षा स्तोत्र ब्रह्मांड पुराण का अंग माना जाता है। इसमें कुल 38 श्लोक हैं जो विनियोग, ध्यान, अंग-न्यास, नाम-स्तुति और फलश्रुति को समेटते हैं। यह अनुष्टुप् छन्द में रचित एक सुव्यवस्थित कवच-स्तोत्र है।

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