📖 ब्रह्मांड पुराण — बुध कौशिक ऋषि
11
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥
सर्वसम्पदाम्
सब सम्पत्तियों के
लोकाभिरामम्
लोकों को रमाने वाले
विपत्तियों को हरने वाले, समस्त सम्पत्तियों के दाता, संसार को आनन्दित करने वाले श्रीराम को बारम्बार नमस्कार है।
12
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥
रामभद्राय
कल्याणकारी राम को
सीतायाः पतये
सीता के पति को
यह श्लोक पूर्व में भी आया है। यहाँ पुनः राम के विभिन्न नामों — रामभद्र, रामचन्द्र, रघुनाथ, सीतापति — से नमस्कार किया गया है।
13
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ।
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ॥
राघवः पातु
राघव रक्षा करें
विश्वामित्रप्रियः
विश्वामित्र के प्रिय
मेरे मस्तक की राघव, ललाट की दशरथनन्दन, नेत्रों की कौसल्यानन्दन और कानों की विश्वामित्रप्रिय श्रीराम रक्षा करें — यह अंग-न्यास का प्रारम्भ है।
14
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ॥
मखत्राता
यज्ञ की रक्षा करने वाले
सौमित्रिवत्सलः
लक्ष्मण को प्रिय
विद्यानिधिः
विद्या के भण्डार
भरतवन्दितः
भरत द्वारा वन्दित
नासिका की यज्ञरक्षक राम, मुख की लक्ष्मणवत्सल, जिह्वा की विद्यानिधि और कण्ठ की भरतवन्दित श्रीराम रक्षा करें।
15
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ॥
दिव्यायुधः
दिव्य अस्त्रधारी
भग्नेशकार्मुकः
शिव-धनुष तोड़ने वाले
जामदग्न्यजित्
परशुराम को जीतने वाले
कन्धों की दिव्यायुधधारी, भुजाओं की शिवधनुष-भंजक, हाथों की सीतापति और हृदय की परशुराम-विजयी श्रीराम रक्षा करें।
16
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ॥
खरध्वंसी
खर राक्षस का वध करने वाले
जाम्बवदाश्रयः
जाम्बवान के आश्रयदाता
सुग्रीवेशः
सुग्रीव के स्वामी
हनुमत्प्रभुः
हनुमान के स्वामी
कमर के मध्य की खरध्वंसी, नाभि की जाम्बवान-आश्रय, कटि की सुग्रीवेश और जाँघों की हनुमत्प्रभु श्रीराम रक्षा करें।
17
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ।
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ॥
ऊरू
दोनों जाँघें (ऊपरी भाग)
रघूत्तमः
रघुवंश में श्रेष्ठ
रक्षःकुलविनाशकृत्
राक्षसकुल का विनाश करने वाले
सेतुकृत्
सेतु (पुल) बनाने वाले
दशमुखान्तकः
दशमुख (रावण) का अन्त करने वाले
जाँघों की रघुश्रेष्ठ एवं राक्षसकुल-विनाशक, घुटनों की सेतुकर्ता और पिण्डलियों की दशमुखान्तक श्रीराम रक्षा करें।
18
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ॥
विभीषणश्रीदः
विभीषण को राज्यश्री देने वाले
अखिलम् वपुः
सम्पूर्ण शरीर
रामबलोपेताम्
रामबल से युक्त
पैरों की विभीषण को श्री देने वाले और सम्पूर्ण शरीर की श्रीराम रक्षा करें। रामबल से युक्त इस रक्षा-स्तोत्र का पाठ पुण्यात्मा व्यक्ति करता है।
19
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयान्वितः ।
प्रसन्नवदनः सौम्यो रामभक्तो विनश्यति ॥
विजयी
विजय प्राप्त करने वाला
प्रसन्नवदनः
प्रसन्न मुखवाला
विनश्यति
(उसका दुःख) नष्ट हो जाता है
इस स्तोत्र का पाठ करने वाला दीर्घायु, सुखी, विजयी और विनम्र होता है — ऐसा इस श्लोक में कहा गया है। 'विनश्यति' का अर्थ है कि उसकी पीड़ाएँ नष्ट हो जाती हैं।
20
दूरात्सुदूरात्कलिकालमाषः तदृक्षतः ।
सर्वे नश्यन्ति ते दोषाः सूर्यस्योदयनाद्यथा ॥
दूरात् सुदूरात्
दूर और अत्यन्त दूर से
नश्यन्ति
नष्ट हो जाते हैं
सूर्यस्य उदयनात्
सूर्य के उदय होने पर
जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार दूर हो जाता है, वैसे ही कलियुग के समस्त दोष दूर हो जाते हैं — ऐसी परम्परागत मान्यता इस श्लोक में व्यक्त होती है।
संदर्भ
श्लोक 13 से 18 तक अंग-न्यास के श्लोक हैं, जिनमें शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा के लिए श्रीराम के विभिन्न नामों का उल्लेख है। यह शैली कवच-स्तोत्रों में सामान्य रूप से पाई जाती है।
इन श्लोकों में श्रीराम को खरध्वंसी, सेतुकृत्, दशमुखान्तक, विभीषणश्रीद आदि विशेषणों से सम्बोधित किया गया है — ये सभी रामायण की प्रमुख घटनाओं से जुड़े हैं।
रामरक्षा · 2 / 4