📖 ब्रह्मांड पुराण — बुध कौशिक ऋषि
1
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषिः । श्रीसीतारामचन्द्रो देवता ।
अनुष्टुप् छन्दः । सीता शक्तिः ।
श्रीमद्धनुमान् कीलकम् ।
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥
देवता
आराध्य देव — सीतारामचन्द्र
विनियोगः
उपयोग — रामचन्द्र की प्रसन्नता हेतु
यह विनियोग श्लोक है। इसमें स्तोत्र के ऋषि (बुध कौशिक), देवता (सीतारामचन्द्र), छन्द (अनुष्टुप्), शक्ति (सीता) और कीलक (हनुमान) बताये गये हैं।
2
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥
रघुनाथस्य
रघुनाथ (राम) का
शतकोटिप्रविस्तरम्
सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत
एकैकम् अक्षरम्
एक-एक अक्षर
महापातकनाशनम्
बड़े पापों का नाश करने वाला
रघुनाथ जी का चरित्र सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत है। इस चरित्र का एक-एक अक्षर महापातकों का नाश करने वाला माना जाता है।
3
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥
नीलोत्पलश्यामम्
नीलकमल के समान श्याम वर्ण
राजीवलोचनम्
कमल के समान नेत्रों वाले
जानकीलक्ष्मणोपेतम्
जानकी और लक्ष्मण से युक्त
जटामुकुटमण्डितम्
जटा-मुकुट से सुशोभित
नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमल-नयन, जानकी एवं लक्ष्मण से युक्त और जटा-मुकुट से सुशोभित श्रीराम का ध्यान करें।
4
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिम्
तलवार, तरकश, धनुष और बाण हाथ में लिए हुए
नक्तंचरान्तकम्
निशाचरों (राक्षसों) का अन्त करने वाले
जगत्त्रातुम्
संसार की रक्षा के लिए
जिनके हाथ में तलवार, तरकश, धनुष और बाण हैं, जो राक्षसों का अन्त करने वाले हैं, जो अपनी लीला से संसार की रक्षा हेतु प्रकट हुए — ऐसे अजन्मा, सर्वव्यापी श्रीराम का ध्यान करें।
5
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ॥
राजमणिः
राजाओं में श्रेष्ठ
सदा विजयते
सदा विजयी होते हैं
निशाचरचमू
राक्षसों की सेना
श्रीराम राजाओं में मणि के समान हैं और सदा विजयी रहते हैं। लक्ष्मीपति श्रीराम का भजन करता हूँ। जिन्होंने राक्षसों की सेना को पराजित किया, उन श्रीराम को नमस्कार है।
6
रामेण्णाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् ॥
रामान्नास्ति
राम से बढ़कर नहीं है
दासः अस्मि अहम्
मैं दास हूँ
श्रीराम से बढ़कर कोई परम आश्रय नहीं है। मैं श्रीराम का दास हूँ — यह भाव इस श्लोक में प्रकट होता है।
7
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ।
श्रीरामे रमणीयधाम्नि भवतो भूयात्सदा मङ्गलम् ।
श्रीराम श्रीराम श्रीराम ॥
चित्तलयः
चित्त का विलीन होना
रमणीयधाम्नि
मनोहर धाम में
मेरा चित्त सदा श्रीराम में लीन रहे। हे राम, मेरा उद्धार करें। रमणीय धाम वाले श्रीराम का सदा मंगल हो — ऐसा भाव इन पंक्तियों में है।
8
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥
रामभद्राय
कल्याणकारी राम को
रघुनाथाय
रघुकुल के नाथ को
सीतायाः पतये
सीता के पति को
श्रीराम को, कल्याणकारी रामभद्र को, रामचन्द्र को, सृष्टिकर्ता को, रघुकुल के नाथ को, सीता के पति को नमस्कार है।
9
श्रीरामं दशरथपुत्रमप्रमेयं सीतापतिं रघुकुलान्वयरत्नदीपम् ।
आजानुबाहुमरविन्दनिभं किरीटिनं कौसल्यानन्दवर्धनम् ॥
दशरथपुत्रम्
दशरथ के पुत्र
अप्रमेयम्
जिन्हें प्रमाण से नापा न जा सके
रघुकुलान्वयरत्नदीपम्
रघुवंश रूपी रत्नमाला के दीपक
आजानुबाहुम्
घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले
कौसल्यानन्दवर्धनम्
कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले
दशरथ-पुत्र, अप्रमेय, सीतापति, रघुवंश-रत्न, आजानुबाहु, कमल सदृश, मुकुटधारी और कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले श्रीराम का वर्णन यहाँ किया गया है।
10
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥
कूजन्तम्
गाते हुए, कूकते हुए
मधुराक्षरम्
मधुर अक्षरों वाले
कविताशाखाम्
कविता रूपी शाखा पर
वाल्मीकिकोकिलम्
वाल्मीकि रूपी कोयल को
कविता रूपी शाखा पर बैठकर 'राम-राम' का मधुर उच्चारण करने वाले वाल्मीकि रूपी कोयल को यहाँ वन्दना की गई है।
संदर्भ
रामरक्षा स्तोत्र ब्रह्मांड पुराण में वर्णित है। इसके ऋषि बुध कौशिक हैं, जिन्हें स्वप्न में यह स्तोत्र प्राप्त हुआ। प्रारम्भ के श्लोकों में स्तोत्र का विनियोग, श्रीराम का ध्यान और उनके विभिन्न नामों से स्तुति की गई है।
श्लोक 5–7 में 'राम' शब्द के विभिन्न विभक्ति-रूपों का प्रयोग करते हुए एक विशेष काव्य-शैली दिखाई देती है, जिसे 'राम-रक्षा' कहा जाता है।
रामरक्षा · 1 / 4