📿 दुर्गा सप्तशती

चतुर्थ अध्याय — शक्रादि स्तुति

दुर्गा सप्तशती · 4 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
या देवी
जो देवी
सर्वभूतेषु
सभी प्राणियों में
विष्णुमाया इति
विष्णुमाया के नाम से
शब्दिता
पुकारी जाती है
नमस्तस्यै
उन्हें नमस्कार
नमो नमः
बारंबार प्रणाम
जो देवी सभी प्राणियों में विष्णुमाया के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 2
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
चेतना इति
चेतना के रूप में
अभिधीयते
कही जाती है
सर्वभूतेषु
सभी जीवों में
जो देवी सभी जीवों में चेतना के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 3
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
बुद्धिरूपेण
बुद्धि के रूप में
संस्थिता
विद्यमान, स्थित
जो देवी सभी प्राणियों में बुद्धि के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 4
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
निद्रारूपेण
निद्रा (नींद) के रूप में
संस्थिता
स्थित हैं
जो देवी सभी प्राणियों में निद्रा के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 5
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
क्षुधारूपेण
भूख / क्षुधा के रूप में
संस्थिता
विद्यमान
जो देवी सभी प्राणियों में क्षुधा — भूख — के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 6
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
शक्तिरूपेण
शक्ति के रूप में
संस्थिता
विद्यमान
जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 7
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
तृष्णारूपेण
तृष्णा / प्यास के रूप में
संस्थिता
विद्यमान
जो देवी सभी प्राणियों में तृष्णा के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 8
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
मातृरूपेण
माँ के रूप में
संस्थिता
विद्यमान
जो देवी सभी जीवों में माँ के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 9
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
लक्ष्मीरूपेण
लक्ष्मी के रूप में
संस्थिता
विद्यमान
जो देवी सभी प्राणियों में लक्ष्मी के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 10
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
सर्वमंगलमांगल्ये
सभी मंगलों में मंगलमयी
शिवे
कल्याणकारी
सर्वार्थसाधिके
सभी कार्य सिद्ध करने वाली
शरण्ये
शरण देने वाली
त्र्यम्बके
तीन नेत्रों वाली
गौरी
गौरी देवी
नारायणि
नारायण से उत्पन्न / विष्णुमाया
नमोऽस्तु ते
आपको नमस्कार है
हे सभी मंगलों में मंगलमयी, हे कल्याणकारी, सभी कार्य सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी, हे नारायणी — आपको नमस्कार है।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, चतुर्थ अध्याय में इन्द्र आदि देवताओं ने देवी की स्तुति की। यह 'या देवी सर्वभूतेषु' स्तुति दुर्गा सप्तशती का हृदय मानी जाती है। देवी को चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, शक्ति, तृष्णा, माता, लक्ष्मी — जीवन के प्रत्येक रूप में पुकारा गया है।

यह स्तुति बताती है कि देवी केवल मंदिर में नहीं, प्रत्येक जीव में — प्रत्येक अनुभव में — विद्यमान हैं। 'सर्वमंगलमांगल्ये' से समाप्त होने वाला श्लोक पारंपरिक रूप से देवी को समर्पित मंगलाचरण में पढ़ा जाता है।

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