शिव पुराण के अनुसार लंका के राजा रावण भगवान शिव के परम भक्त थे। वे चाहते थे कि शिव लंका में सदैव के लिए विराजित हों। इसी इच्छा से उन्होंने कैलाश पर्वत पर कठोर तपस्या की।
शिव पुराण में बताया गया है कि शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और एक शिवलिंग दिया। शर्त यह थी कि रावण इस शिवलिंग को कहीं ज़मीन पर नहीं रखेंगे — यदि रखा, तो शिवलिंग वहीं स्थापित हो जाएगा।
देवताओं को यह बात उचित नहीं लगी। उन्होंने मिलकर एक उपाय किया जिससे रावण को शिवलिंग ज़मीन पर रखना पड़ा। शिव पुराण के अनुसार उसी क्षण शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया।
यहीं भगवान शिव वैद्यनाथ के नाम से विराजित हैं। वैद्य का अर्थ चिकित्सक है, और नाथ का अर्थ स्वामी। दो परंपराएँ प्रचलित हैं — एक झारखंड के देवघर को इस स्थान के रूप में मानती है, दूसरी महाराष्ट्र के परली वैजनाथ को। शिव पुराण में दोनों परंपराओं के संदर्भ मिलते हैं।
शिव पुराण में रावण की भक्ति से जुड़ी इस कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की एक विशेष परंपरा यह है कि यहाँ दो स्थानों को इस ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता रहा है। उत्तर भारत की परंपरा में देवघर (झारखंड) को मान्यता मिली है। महाराष्ट्र की परंपरा में परली वैजनाथ को इस स्थान के रूप में पूजा जाता रहा है। दोनों स्थानों पर पुराण ग्रंथों के संदर्भ मिलते हैं।
देवघर का मंदिर परिसर बैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता रहा है। श्रावण मास में यहाँ कांवर यात्रा की परंपरा रही है, जिसमें भक्त सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल आते आए हैं। परली वैजनाथ का मंदिर भी प्राचीन है और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित है।
- दोनों स्थानों के मंदिर वर्ष भर खुले रहते हैं। भक्त वहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- देवघर में श्रावण मास के समय कांवर यात्रा की विशेष परंपरा देखी जाती है।
- परली वैजनाथ में भी श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर विशेष आयोजन होते रहे हैं।
- दोनों स्थानों पर मंदिर परिसर में अन्य प्राचीन मंदिर भी मिलते हैं।