ब्रह्म पुराण के गौतमी माहात्म्य के अनुसार यहाँ ऋषि गौतम का आश्रम था। पुराण में कथा आती है कि एक बार पूरे क्षेत्र में अकाल पड़ा। ऋषि गौतम ने अपनी तपस्या से अन्न और जल की व्यवस्था की।
अन्य ऋषियों के साथ हुए मतभेद के पश्चात गौतम ऋषि ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे गंगा को इस क्षेत्र में ले आएँ। शिव ने उनकी प्रार्थना सुनी।
गंगा यहाँ गोदावरी के रूप में प्रकट हुईं। ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी का उद्गम होता है। इसी कारण गोदावरी को दक्षिण की गंगा भी कहा जाता रहा है।
भगवान शिव यहाँ त्र्यंबकेश्वर के नाम से विराजित हैं। त्र्यंबक का अर्थ है तीन नेत्रों वाले। यह नाम शिव के त्रिनेत्र स्वरूप का प्रतीक है। मंदिर में शिवलिंग की तीन छोटी मुखाकृतियाँ हैं — जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रतीक माना जाता रहा है।
त्र्यंबकेश्वर मंदिर के पास ब्रह्मगिरि पर्वत से ही गोदावरी नदी का उद्गम होता है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि यह गोदावरी के उद्गम स्थल पर स्थित है। नासिक कुंभ मेला के चार स्थलों में से एक है। यहाँ हर बारह वर्ष में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन होता आया है।
मंदिर का स्थापत्य काले पत्थर से बना नागर शैली में है। ब्रह्मगिरि पर्वत मंदिर के पीछे स्थित है। पर्वत पर परिक्रमा का मार्ग है, जो परंपरागत रूप से तीर्थयात्रा का हिस्सा रहा है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- मंदिर में शिवलिंग की तीन छोटी मुखाकृतियाँ हैं — यह त्र्यंबकेश्वर की विशेषता है।
- ब्रह्मगिरि पर्वत पर परिक्रमा का मार्ग है, जहाँ गोदावरी का उद्गम भी देखा जा सकता है।
- महाशिवरात्रि और श्रावण मास में मंदिर परिसर में विशेष भीड़ रहती है।