पहला ज्योतिर्लिंग

सोमनाथ

बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहला, समुद्र के किनारे बसा हुआ
📍 प्रभास पाटन, गुजरात
स्थान
प्रभास पाटन, सौराष्ट्र, गुजरात
नदी / सागर
अरब सागर का तट
क्रम
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में पहला
📖 शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता

शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अनुसार दक्ष प्रजापति की सत्ताईस कन्याएँ थीं। इन सभी का विवाह चन्द्रदेव से हुआ था। ये सत्ताईस कन्याएँ ही आकाश के नक्षत्र कहलाती हैं। चन्द्रदेव को इनमें रोहिणी सबसे प्रिय थीं। वे बाकी छब्बीस पत्नियों की ओर ध्यान नहीं देते थे।

बाकी पत्नियाँ दुखी होकर अपने पिता दक्ष के पास गईं। दक्ष ने चन्द्रदेव को समझाया, पर बात नहीं बनी। तब क्रोध में आकर दक्ष ने उन्हें श्राप दे दिया। श्राप था कि चन्द्रदेव क्षय रोग से ग्रस्त हो जाएँगे और उनकी चमक धीरे-धीरे घटती जाएगी। श्राप के कारण चन्द्रमा का प्रकाश सचमुच कम होने लगा।

शिव पुराण में आगे बताया गया है कि चन्द्रदेव दुखी मन से पश्चिमी समुद्र के किनारे प्रभास तीर्थ पहुँचे। वहाँ उन्होंने कठोर तपस्या की और महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। शिव ने उन्हें श्राप से आधी मुक्ति दी। इसी कारण आज भी चन्द्रमा हर महीने घटता है और फिर बढ़ता है।

कथा के अनुसार चन्द्रदेव ने उसी स्थान पर कृतज्ञता के साथ एक शिवलिंग की स्थापना की। चन्द्रदेव का दूसरा नाम सोम है। इसलिए यहाँ विराजे शिव सोमनाथ कहलाए — अर्थात सोम के नाथ। यही द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में पहला नाम आता है।

चन्द्रदेव ने प्रभास तीर्थ में तपस्या की, और कृतज्ञता के साथ वहीं शिवलिंग स्थापित किया।

सोमनाथ मंदिर भारत के पश्चिमी छोर पर अरब सागर के किनारे बसा है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र ऐसा स्थान है जो समुद्र के तट पर है। मंदिर के पीछे लहरों की आवाज़ दिन-रात सुनाई देती है। भक्त यहाँ दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं।

सोमनाथ के पास ही त्रिवेणी संगम है। परंपरा के अनुसार यहाँ हिरण, कपिला और सरस्वती नदियाँ मिलकर समुद्र में समाती हैं। शिव पुराण में इस पूरे क्षेत्र को प्रभास क्षेत्र कहा गया है। श्रावण मास और महाशिवरात्रि के समय यहाँ विशेष भीड़ देखी जाती है।

निर्माण
वर्तमान मंदिर का स्वरूप सन् 1951 में पुनः निर्मित हुआ।
शैली
चालुक्य शैली, कैलाश-मेरु प्रकार का बलुआ पत्थर निर्माण
समुद्र
मंदिर के ठीक पीछे अरब सागर की लहरें टकराती हैं
विशेष
बारह ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र समुद्र तट पर स्थित मंदिर
✈️
हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा दीव लगभग 63 किलोमीटर दूर है। राजकोट हवाई अड्डा लगभग 200 किलोमीटर पर पड़ता है।
🚂
रेल मार्ग
वेरावल रेलवे स्टेशन सबसे पास है। यह मंदिर से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर है।
🚗
सड़क मार्ग
अहमदाबाद से लगभग 400 किलोमीटर और राजकोट से सीधी सड़कें जुड़ी हुई हैं। गुजरात राज्य की बसें नियमित चलती हैं।
🌊
विशेष
मंदिर के पास त्रिवेणी संगम है, जहाँ तीन नदियाँ समुद्र से मिलती हैं।
1 / 12 मल्लिकार्जुन →