शिव पुराण के अनुसार एक बार देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हुआ। दानव विजयी हो रहे थे। तब देवताओं ने मिलकर भगवान शिव की आराधना की। शिव उनकी पुकार पर प्रसन्न हुए और ज्योतिर्लिंग के रूप में यहाँ प्रकट हुए।
इसी क्षेत्र में राजा मांधाता ने भी कठोर तपस्या की थी। शिव पुराण में बताया गया है कि शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर इस द्वीप पर सदैव के लिए निवास करने का वचन दे दिया।
इस द्वीप का आकार ऊपर से देखने पर ओम (ॐ) के समान दिखाई देता है। इसी कारण इस स्थान का नाम ओंकारेश्वर पड़ा। ओंकार का अर्थ ही ओम का स्वर है।
मंदिर नर्मदा नदी के बीच मांधाता द्वीप पर स्थित है। यहाँ एक ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर के रूप में और दूसरा अमलेश्वर के रूप में पास के तट पर माना जाता रहा है।
मांधाता द्वीप का आकार ऊपर से देखने पर ओम (ॐ) के समान दिखाई देता है — इसी कारण इस स्थान का नाम ओंकारेश्वर पड़ा।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति विशेष है। यह नर्मदा नदी के बीच एक प्राकृतिक द्वीप पर स्थित है। नर्मदा यहाँ दो धाराओं में बँटकर द्वीप के दोनों ओर बहती है। यह दृश्य अपने आप में अनोखा है।
नर्मदा नदी पुराण परंपरा में अत्यंत पवित्र मानी जाती रही है। पुराणों में नर्मदा परिक्रमा का माहात्म्य वर्णित है। ओंकारेश्वर इस परिक्रमा का एक प्रमुख विश्राम स्थल भी रहा है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- परंपरा में भक्त नर्मदा में स्नान कर के मंदिर में दर्शन के लिए जाते आए हैं।
- द्वीप पर परिक्रमा का मार्ग है, जहाँ कई छोटे मंदिर भी मिलते हैं।
- तट के दूसरे ओर अमलेश्वर मंदिर के दर्शन भी पारंपरिक हैं।