महाभारत युद्ध के पश्चात पांडव अपने कुल के विनाश और स्वजनों की हत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। वे भगवान शिव का आशीर्वाद लेने निकले।
शिव पांडवों से रुष्ट थे, इसलिए उन्होंने बैल का रूप धारण कर हिमालय में छुपने का प्रयास किया। भीम ने उन्हें पहचान लिया और बैल की पीठ को पकड़ लिया।
भगवान शिव बैल के रूप में भूमि में अंतर्ध्यान हो गए — केवल उनका कूबड़ (पृष्ठभाग) वहाँ रह गया। वही आज केदारनाथ का शिवलिंग है।
शिव के शरीर के अन्य भाग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए — जिन्हें आज पंचकेदार के नाम से जाना जाता है।
केदारनाथ बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और छोटा चार धाम यात्रा का अभिन्न अंग है। हिमालय की गोद में बसा यह मंदिर प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम है।
यहाँ का शिवलिंग त्रिकोणाकार है — यह अन्य ज्योतिर्लिंगों से भिन्न है। भक्त इसे घी लगाकर पूजते हैं और इसे स्पर्श कर सकते हैं।
- मुख्य गर्भगृह में त्रिकोणाकार शिवलिंग — घी से लिपटा, स्पर्श-दर्शन उपलब्ध
- मंदिर के पीछे — भैरवनाथ मंदिर, जिन्हें क्षेत्र का संरक्षक माना जाता है
- मंदाकिनी नदी का उद्गम और हिमनदी का दृश्य
- आदि शंकराचार्य की समाधि — मंदिर परिसर के भीतर