शिव पुराण के अनुसार उज्जयिनी (आज की उज्जैन) में चन्द्रसेन नामक एक राजा राज करते थे। वे शिव के परम भक्त थे। उज्जयिनी में एक छोटा बालक भी रहता था जो मिट्टी के शिवलिंग बनाकर पूजा करता था।
उसी समय दूसरे राज्यों के राजाओं ने उज्जयिनी पर आक्रमण की योजना बनाई। चन्द्रसेन ने पूरी श्रद्धा से शिव की पूजा की। शिव पुराण में बताया गया है कि शिव ने तब महाकाल के रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों की रक्षा की।
इसी स्थान पर शिव महाकालेश्वर के नाम से विराजित हैं। महाकाल का अर्थ है काल के स्वामी — समय के देवता। स्कंद पुराण के अवंती खण्ड में उज्जयिनी का माहात्म्य विस्तार से वर्णित है।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की एक विशेषता है कि इसकी भस्म आरती सबसे प्रसिद्ध मानी जाती है। परंपरा में यह आरती सुबह के समय होती है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में अकेला दक्षिणमुखी शिवलिंग है।
उज्जैन का यह शिवलिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में अकेला दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग माना जाता रहा है।
उज्जैन सप्त पुरियों में से एक है — पुराण परंपरा में इसे अवंती और उज्जयिनी के नामों से भी पुकारा गया है। महाभारत और कई पुराण ग्रंथों में इस नगर का उल्लेख मिलता है। यह भारत के अत्यंत प्राचीन नगरों में से एक माना जाता रहा है।
महाकालेश्वर मंदिर क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। उज्जैन सिंहस्थ कुंभ मेला के चार स्थलों में से एक है। यहाँ हर बारह वर्ष में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन होता आया है। मंदिर परिसर में महाकाल के साथ कई अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- परंपरा में सुबह के समय भस्म आरती होती है, जो विशेष मानी जाती रही है।
- महाशिवरात्रि और श्रावण मास में यहाँ विशेष भीड़ रहती है।
- मंदिर परिसर में महाकाल के साथ कई अन्य प्राचीन मंदिर भी हैं।