स्कंद पुराण की काशी खण्ड में काशी का विस्तृत माहात्म्य वर्णित है। पुराण के अनुसार काशी भगवान शिव की प्रिय नगरी मानी जाती रही है। शिव यहाँ सदैव विराजते हैं — इसी कारण इसे काशी विश्वनाथ कहा जाता है। विश्वनाथ का अर्थ है विश्व के नाथ।
शिव पुराण में काशी को त्रिशूल के ऊपर बसी हुई नगरी के रूप में वर्णित किया गया है। पुराण परंपरा में यह माना जाता रहा है कि काशी पृथ्वी पर नहीं, बल्कि शिव के त्रिशूल पर टिकी है — इसलिए यह सदैव शाश्वत मानी जाती रही है।
काशी का उल्लेख वेदों और उपनिषदों में भी मिलता है। यह भारत के सबसे पुराने निवास स्थलों में से एक माना जाता रहा है। पुराण ग्रंथों में इसे अविमुक्त क्षेत्र भी कहा गया है।
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित है। मंदिर के पास ही दशाश्वमेध, मणिकर्णिका और कई अन्य प्राचीन घाट हैं। यह पूरा क्षेत्र शिव परंपरा का केंद्र माना जाता रहा है।
स्कंद पुराण की काशी खण्ड में काशी को शिव की प्रिय नगरी और अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है।
काशी सप्त पुरियों में से एक है और भारत के अत्यंत प्राचीन तीर्थ क्षेत्रों में गिनी जाती रही है। पुराणों में इसे आनंद वन, अविमुक्त और रुद्रावास जैसे नामों से भी पुकारा गया है। यहाँ की गलियाँ, घाट और मंदिर एक हज़ार वर्षों से भी अधिक समय से तीर्थयात्रियों का स्वागत करते आए हैं।
गंगा के घाटों पर सुबह और शाम की आरती परंपरा का एक विशेष अंग रही है। दशाश्वमेध घाट पर शाम की गंगा आरती सबसे प्रसिद्ध परंपराओं में से एक मानी जाती रही है। महाशिवरात्रि और श्रावण मास में यहाँ विशेष परंपरा देखी जाती है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- परंपरा में भक्त गंगा में स्नान कर के मंदिर में दर्शन के लिए जाते आए हैं।
- गंगा आरती शाम के समय दशाश्वमेध घाट पर देखी जा सकती है।
- महाशिवरात्रि और श्रावण मास में मंदिर परिसर में विशेष भीड़ रहती है।