शिव पुराण के अनुसार त्रिपुरासुर नामक एक दानव अपने तपोबल से बहुत शक्तिशाली हो गया था। उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था। देवताओं ने मिलकर भगवान शिव से प्रार्थना की।
शिव पुराण में बताया गया है कि शिव त्रिपुरासुर का सामना करने के लिए इसी क्षेत्र में प्रकट हुए। उन्होंने अपने तेज से दानव का अंत कर देवताओं को राहत दी।
इस संघर्ष के बाद शिव के शरीर से जो पसीना बहा, वही आगे चलकर भीमा नदी के रूप में प्रवाहित हुआ। भीमा नदी आज भी इसी क्षेत्र से निकलती है।
इस स्थान पर शिव भीमाशंकर के नाम से विराजित हैं। मंदिर सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच स्थित है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता रहा है।
इसी स्थान पर भीमा नदी का उद्गम होता है — पुराण परंपरा में इसे शिव के संघर्ष से जोड़ा जाता रहा है।
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग सह्याद्रि की पहाड़ियों के बीच घने वनों में स्थित है। यह क्षेत्र भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य का भी हिस्सा है। पहाड़ों, नदियों और वनों का यह संगम इस स्थान को विशेष बनाता है।
मंदिर का स्थापत्य नागर शैली में है। पुरानी परंपरा के अनुसार यह मंदिर 13वीं शताब्दी से भी पहले से अस्तित्व में रहा है। महाशिवरात्रि और श्रावण सोमवार को यहाँ विशेष परंपरा देखी जाती है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ हैं — चारों ओर हरियाली और पहाड़ों का दृश्य।
- महाशिवरात्रि और श्रावण मास में भक्तों की संख्या विशेष रूप से बढ़ती है।
- मंदिर के पास से भीमा नदी का उद्गम स्थल भी देखा जा सकता है।