भागवत पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार द्वारका भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी थी। मथुरा से आने के बाद कृष्ण ने अपने यदुवंशियों के साथ इस नगरी की स्थापना की।
महाभारत में भी द्वारका का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इसे द्वारवती के नाम से भी पुकारा गया है। पुराण ग्रंथों में बताया गया है कि यह नगरी अपने समय में अत्यंत सुंदर और सुव्यवस्थित नगरी मानी जाती थी।
द्वारका का अर्थ है द्वारों वाली नगरी। पुराण परंपरा में यह कहा जाता रहा है कि इस नगर के अनेक द्वार थे। यह अरब सागर के तट पर बसी थी और गोमती नदी यहाँ समुद्र से मिलती थी।
8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने द्वारका को चार धामों में से एक के रूप में स्थापित किया। उन्होंने यहाँ पश्चिमाम्नाय शारदा पीठ की स्थापना की, जिसे द्वारका मठ कहा जाता है।
भागवत पुराण के अनुसार द्वारका भगवान श्रीकृष्ण की प्राचीन राजधानी थी।
द्वारका चार धामों में पश्चिम का धाम है। यह सप्त पुरियों में भी एक है। मुख्य मंदिर द्वारकाधीश के नाम से जाना जाता है — द्वारकाधीश का अर्थ है द्वारका के स्वामी, अर्थात कृष्ण। मंदिर का स्थापत्य चालुक्य शैली में है।
द्वारका के पास ही बेट द्वारका नामक एक छोटा द्वीप है, जो परंपरा में कृष्ण के निवास स्थल से जुड़ा रहा है। पास ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भी स्थित है। इसी कारण द्वारका यात्रा करने वाले भक्त इन दोनों स्थानों के दर्शन भी करते आए हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर भी हैं, जो विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित हैं।
- जन्माष्टमी पर यहाँ विशेष परंपरा रही है।
- द्वारका, बेट द्वारका और नागेश्वर — तीनों के दर्शन एक साथ की जाती रही है।