कृष्ण यहाँ चार प्रकार के यज्ञों का नाम लेते हैं — द्रव्ययज्ञ (धन दान करना), तपोयज्ञ (तपस्या करना), योगयज्ञ (योग-साधना), और स्वाध्याय-ज्ञानयज्ञ (शास्त्र पढ़ना और ज्ञान प्राप्त करना)। ये सभी दृढ़ व्रत वाले साधक करते हैं।
यह सूची बताती है कि साधना का एक ही रूप नहीं है। जिसके पास धन है वह दान से, जिसके पास शरीर की शक्ति है वह तप से, जिसके पास ज्ञान है वह पढ़ने-सिखाने से — सब अपने-अपने तरीके से यज्ञ कर सकते हैं।