📿 श्लोक संग्रह

अकीर्तिं चापि भूतानि

गीता 2.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥
अकीर्तिम्
अपयश
च अपि
और भी
भूतानि
लोग
कथयिष्यन्ति
कहते रहेंगे
ते अव्ययाम्
तुम्हारा अमिट
सम्भावितस्य
जिसका सम्मान हो
अकीर्तिः
अपयश
मरणात् अतिरिच्यते
मृत्यु से भी बड़ा दुःख

कृष्ण कहते हैं — लोग तुम्हारी अमिट अपकीर्ति बताते रहेंगे। और जिसका सम्मान होता है, उसके लिए अपयश मृत्यु से भी बड़ा दुःख होता है। यह बात कड़वी लगती है लेकिन जीवन की सच्चाई है।

एक महान योद्धा के लिए यश और कीर्ति उसकी पहचान है। जैसे एक किसान की पहचान उसकी मेहनत और फ़सल से है — यदि वह मेहनत छोड़ दे, तो उसकी पहचान भी जाती है। अर्जुन के लिए उनकी वीरता ही उनकी पहचान थी।

भगवद्गीता में यह श्लोक अर्जुन की सामाजिक प्रतिष्ठा के संदर्भ में है। उस काल में एक क्षत्रिय की कीर्ति उसके जीवन का आधार थी।

यह भावनात्मक तर्क है — कृष्ण अर्जुन को दर्पण दिखा रहे हैं कि भागने से वे जो खोएँगे, वह पाने से बड़ा होगा।

अध्याय 2 · 34 / 72
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