📿 श्लोक संग्रह

ज्ञानं कर्म च कर्ता च

गीता 18.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥
ज्ञानम् कर्म च कर्ता च
ज्ञान, कर्म और कर्ता
त्रिधा एव
तीन प्रकार का ही
गुणभेदतः
गुण-भेद से — तीन गुणों के भेद से
गुणसंख्याने
गुणों की गणना में — गुण-विवेचन में
यथावत्
जैसे हैं वैसे — यथार्थ रूप से
शृणु
सुनो

भगवान कहते हैं — ज्ञान, कर्म और कर्ता — तीनों को गुण-भेद से तीन-तीन प्रकार का बताया जाता है। यह गुण-विवेचन का विज्ञान है। इसे ध्यान से सुनो।

यह श्लोक एक लंबी शृंखला की शुरुआत है। जैसे ज्ञान तीन प्रकार का है — वैसे ही कर्म भी तीन, और कर्ता भी तीन। गुण-भेद से पूरी सृष्टि और सब मानवीय क्रियाएँ समझी जा सकती हैं।

गीता का यह भाग — 18.19 से 18.40 तक — गुण-विवेचन का विस्तृत खंड है। यहाँ ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख — सब को तीन-तीन प्रकार में बाँटा जाएगा।

सांख्य-दर्शन में गुण-विश्लेषण को ज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। गीता यहाँ उसी परंपरा का उपयोग करती है।

अध्याय 18 · 19 / 78
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