यह श्लोक पूरे ब्रह्म-वर्णन का शिखर है। ब्रह्म सूरज, चाँद, तारों से भी परे — ज्योतियों का ज्योति है। अंधकार उसे नहीं छू सकता। वह ज्ञान भी है, जानने योग्य भी है, और ज्ञान से ही पाया जाता है।
और कहाँ है वह? दूर किसी आकाश में नहीं — सबके हृदय में स्थित है। यह बात दादी बच्चे को यूँ समझाए — 'जो तुम्हारे भीतर जागता है, सोचता है, महसूस करता है — वही उसका घर है।'