📿 श्लोक संग्रह

एवमुक्त्वा ततो राजन्

गीता 11.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥
एवम् उक्त्वा
ऐसा कहकर
महायोगेश्वरः
महायोगेश्वर
हरिः
हरि (श्रीकृष्ण)
परमं रूपम् ऐश्वरम्
परम ऐश्वर्य-रूप

संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं — हे राजन्, इस प्रकार कहकर, महायोगेश्वर हरि ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्य-रूप दिखाया। यह वह क्षण था जब संसार के किसी मनुष्य ने पहली बार साक्षात् विश्वरूप देखा।

संजय यहाँ सूत्रधार की भूमिका में हैं। वे स्वयं भी इस अलौकिक दृश्य को देख रहे हैं और राजा धृतराष्ट्र को शब्दों में बता रहे हैं।

यह श्लोक एक संधि-बिंदु है — अर्जुन और कृष्ण का संवाद यहाँ रुकता है और संजय का वर्णन शुरू होता है।

अगले श्लोकों (11.10-11) में संजय विश्वरूप का वर्णन करेंगे — अनेक मुख, नेत्र, आभूषण, अस्त्र।

अध्याय 11 · 9 / 55
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