अर्जुन कहते हैं — सामने से नमस्कार, पीछे से नमस्कार, सब ओर से नमस्कार — हे सर्व। आपकी शक्ति अनंत है, पराक्रम असीमित है। आपने सब कुछ व्याप्त किया है — इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
यह श्लोक एक दार्शनिक सत्य को सरल शब्दों में कहता है — जो सब में व्याप्त है, वही 'सर्व' — सब — है।