📿 श्लोक संग्रह

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः

गीता 11.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
आदिदेवः पुरुषः पुराणः
आदि देव, पुरातन पुरुष
परं निधानम्
सर्वोच्च खजाना, आधार
वेत्ता वेद्यम्
जानने वाले और जानने योग्य
अनन्तरूप
हे अनंत रूप वाले

अर्जुन कहते हैं — हे अनंत रूप, आप ही आदि देव हैं, पुरातन पुरुष हैं। आप ही इस जगत के परम निधान हैं। आप ही जानने वाले हैं, जानने योग्य हैं और परम धाम भी आप ही हैं। इस सारे जगत को आपने व्याप्त किया हुआ है।

यहाँ 'परं धाम' — परम निवास-स्थान — वही है जिसे गीता के 15वें अध्याय में 'परमं पदम्' कहा जाएगा। वह परमगति, वह अंतिम शरण।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन का यह स्तवन गीता के सबसे काव्यात्मक अंशों में एक है।

अगले श्लोक (11.39) में अर्जुन कृष्ण को वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्र और प्रजापति के रूप में भी देखते हैं।

अध्याय 11 · 38 / 55
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