अर्जुन कहते हैं — हे अनंत रूप, आप ही आदि देव हैं, पुरातन पुरुष हैं। आप ही इस जगत के परम निधान हैं। आप ही जानने वाले हैं, जानने योग्य हैं और परम धाम भी आप ही हैं। इस सारे जगत को आपने व्याप्त किया हुआ है।
यहाँ 'परं धाम' — परम निवास-स्थान — वही है जिसे गीता के 15वें अध्याय में 'परमं पदम्' कहा जाएगा। वह परमगति, वह अंतिम शरण।