अर्जुन कहते हैं — हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से जगत आनंदित होता है और अनुरक्त होता है। राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगण आपको प्रणाम कर रहे हैं।
जो भव्य, महान और शुभ है — उसे देखकर जगत प्रसन्न होता है। यह सत्य का स्वाभाविक प्रभाव है।